Even a novice understands the politics behind throwing a sumptuous Iftaar feast by Nitish Kumar at his official residence as the Chief Minister of Bihar. He’s not the only politician to have done so. The Congress CMs, and his foe-turned-mentor Lalu before him, had routinely hosted Iftaar or Eid-ul-Fitra party at the conclusion of the holy month of Ramazan. The leaders of the BJP, a party reputed as unfriendly to Muslims also break bread with the Muslim invitees on this occasion.

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I feel laughing… I feel kicking… I feel spitting… I mean I want to do all nasty things when I come across people who play ignorance or act oblivious of, and when you have reasons to believe that the particular incident has been in their knowledge constantly for decades together. Yet they didn’t even hiss about it till someone else brings the incident to light. It is this social double standard that Bihar would go down with in contemporary history of independent India.

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Right after the Indian Independence (1947), the standard of education in Bihar was at par with what the Britishers had set out during their regime. Passing matriculation exam, with its emphasis on math and English, was tough. There used to be a category of dropouts called “Matric Fail” and just for making through the high school to the Matric Board exam, the candidates were regarded in the society as educated people. They would get lower level but respectable jobs.

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शिक्षा के कारोबार का काला-धंधा देशव्यापी समस्या है, ये सिर्फ बिहार तक ही सीमित नहीं है l निःसन्देह ये दुःखद है कि हालिया टॉपर्स प्रकरणसे बिहार की बदनामी हुई है और बिहारजगहँसाई का पात्रबना दियागया हैl मगर ऐसा नहीं है कि ऐसा देश के किसी और राज्य में नहीं होता या नहीं हुआ है, अनेकों उदहारण हैं लेकिन उनको इतना तुल नहीं दिया जाता और ना ही उनको आधार बना कर वहाँ की मेधा पर सवाल खड़े किए जाते हैं l ऐसा क्यूँ? ...बिहार के प्रति पूर्वाग्रहया बिहार की मेधा से लगातार हर क्षेत्र में पिछड़ते जाने से उत्त्पन्न ढाह?

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कल राजद संसदीय दल की बैठक के बाद वरिष्ठ राजद नेताओं ने नीतीश कुमार को सीधे अपने निशाने पर लियाl संकेत कुछ अच्छे नहीं हैं नीतीश जी के लिए...

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Who killed Rajdev Ranjan, the correspondent of a Hindi newspaper, is a question that reverberates today throughout the public sphere of Bihar and fuels private anxieties of those living in Biharis. The more we know the more stridently we ask the question 'Who killed Rajdev Ranjan?' We know who did it. By asking the question we are merely trying to point the needle of suspicion away from our own guilty selves. The society as a whole killed Rajdev Ranjan.

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सीवान में हुई पत्रकार राजदेव जी की हत्या के तार सीधे तौर से वर्षों से जेल में बंद अपराधी से नेता बने दुर्दांत शहाबुद्दीन से जुड़ते दिख रहे हैं l जेल में बंद रहने के बावजूद सीवान और इसके आस-पास के इलाकों में शहाबुद्दीन का नेटवर्क कभी भी कमजोर नहीं हुआ और अभी भी बेलगाम हो कर काम कर रहा है l विगत वर्षों में अनेकों हत्याएं शहाबुद्दीन से जुड़े गुर्गों ने बेख़ौफ़ हो कर की हैं l सुशासन के तमाम दावों के बावजूद जेल में बंद अपराधी सरगनाओं व् आपराधिक पृष्ठ-भूमि वाले नेताओं का तांडव बिहार में बदस्तूर जारी ही रहा है, ये सुशासन की सार्थकता पर बड़ा प्रश्न-चिन्ह है?

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आज हिन्दी साहित्य के ओज-पुरुष राष्ट्र कविरामधारी सिंह 'दिनकर' जी की पुण्य-तिथि है.... हिन्दी साहित्य की बात तो क्या भारत में साहित्य (किसी भी भाषा) की कोई भी चर्चा दिनकर जी की चर्चा के बिना अधूरी है. अजीब विडम्बना है दिनकर जी की कृतियों पर दशकों पहले से विदेशों में शोध हो रहे हैं, अनेकों विदेशी विश्वविद्यालयों व शोध-संस्थानों में 'दिनकर-चैपटर्स' हैं लेकिन अपने ही देश और अपनी ही मिट्टी बिहार में दिनकर जी की याद लोगों को सिर्फ जयंती व पुण्य-तिथि पर आती है l

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