Right after the Indian Independence (1947), the standard of education in Bihar was at par with what the Britishers had set out during their regime. Passing matriculation exam, with its emphasis on math and English, was tough. There used to be a category of dropouts called “Matric Fail” and just for making through the high school to the Matric Board exam, the candidates were regarded in the society as educated people. They would get lower level but respectable jobs.

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शिक्षा के कारोबार का काला-धंधा देशव्यापी समस्या है, ये सिर्फ बिहार तक ही सीमित नहीं है l निःसन्देह ये दुःखद है कि हालिया टॉपर्स प्रकरणसे बिहार की बदनामी हुई है और बिहारजगहँसाई का पात्रबना दियागया हैl मगर ऐसा नहीं है कि ऐसा देश के किसी और राज्य में नहीं होता या नहीं हुआ है, अनेकों उदहारण हैं लेकिन उनको इतना तुल नहीं दिया जाता और ना ही उनको आधार बना कर वहाँ की मेधा पर सवाल खड़े किए जाते हैं l ऐसा क्यूँ? ...बिहार के प्रति पूर्वाग्रहया बिहार की मेधा से लगातार हर क्षेत्र में पिछड़ते जाने से उत्त्पन्न ढाह?

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कल राजद संसदीय दल की बैठक के बाद वरिष्ठ राजद नेताओं ने नीतीश कुमार को सीधे अपने निशाने पर लियाl संकेत कुछ अच्छे नहीं हैं नीतीश जी के लिए...

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Who killed Rajdev Ranjan, the correspondent of a Hindi newspaper, is a question that reverberates today throughout the public sphere of Bihar and fuels private anxieties of those living in Biharis. The more we know the more stridently we ask the question 'Who killed Rajdev Ranjan?' We know who did it. By asking the question we are merely trying to point the needle of suspicion away from our own guilty selves. The society as a whole killed Rajdev Ranjan.

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सीवान में हुई पत्रकार राजदेव जी की हत्या के तार सीधे तौर से वर्षों से जेल में बंद अपराधी से नेता बने दुर्दांत शहाबुद्दीन से जुड़ते दिख रहे हैं l जेल में बंद रहने के बावजूद सीवान और इसके आस-पास के इलाकों में शहाबुद्दीन का नेटवर्क कभी भी कमजोर नहीं हुआ और अभी भी बेलगाम हो कर काम कर रहा है l विगत वर्षों में अनेकों हत्याएं शहाबुद्दीन से जुड़े गुर्गों ने बेख़ौफ़ हो कर की हैं l सुशासन के तमाम दावों के बावजूद जेल में बंद अपराधी सरगनाओं व् आपराधिक पृष्ठ-भूमि वाले नेताओं का तांडव बिहार में बदस्तूर जारी ही रहा है, ये सुशासन की सार्थकता पर बड़ा प्रश्न-चिन्ह है?

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आज हिन्दी साहित्य के ओज-पुरुष राष्ट्र कविरामधारी सिंह 'दिनकर' जी की पुण्य-तिथि है.... हिन्दी साहित्य की बात तो क्या भारत में साहित्य (किसी भी भाषा) की कोई भी चर्चा दिनकर जी की चर्चा के बिना अधूरी है. अजीब विडम्बना है दिनकर जी की कृतियों पर दशकों पहले से विदेशों में शोध हो रहे हैं, अनेकों विदेशी विश्वविद्यालयों व शोध-संस्थानों में 'दिनकर-चैपटर्स' हैं लेकिन अपने ही देश और अपनी ही मिट्टी बिहार में दिनकर जी की याद लोगों को सिर्फ जयंती व पुण्य-तिथि पर आती है l

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बिहार की राजधानी व दक्षिणी बिहार को उत्तर बिहार से जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण लिंक जर्जर गाँधी सेतू अब बिहार की जनता के लिए नासूर बन चूका है l किसी भी दिन ढह जाने की इस पुल की स्थिति और वर्षों से इस पर रोज लगने वाले महाजाम केंद्र व् राज्य सरकार एवं स्थानीय प्रशासन के तमाम प्रयासों व् दावों के बावजूद यथावत हैं l नीतीश जी के पिछले कथित सुशासनी १० साल के लम्बे कार्यकाल में भी इस पुल की मरम्मत के लिए केंद्र की सरकार के साथ समन्वय की न तो कोई सार्थक पहल हुई न ही इस पर नित्य लगने वाले जाम का सिलसिला ख़त्म हुआ l

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("The act of God" remark in the context of the Calcutta bridge collapse and the indigence senior civil servants and police officers as reflected in their property statements triggered these musings. Some of the remarks and statements have appeared in my interviews or articles published elsewhere. After all, you can't have something new to say everyday on the timeworn old issue of corruption.)

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चंद दिनों पहले २३ मार्च को हरेक साल की भांति एक बार फिर लोहिया जयन्ती की रस्म-अदायगी पूरे देश में भाषणों और माल्यर्पणों के दौर के साथ संपन्न हुई । आज डॉ. लोहिया की प्रासंगिकता सिर्फ आयोजनों व् व्याख्यानों तक ही सीमित है । डॉ. लोहिया के सिद्धांतों को अमलीजामा पहनाने का साहस व् संकल्प न तो उनके 'कथित अनुयायियों' में है न ही बारम्बार उनका जिक्र करने वालों में

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