Year after year hundreds of new trains are introduced but the number of employees handling safety services in Railways has been declining. As on date with 1.5 lakh unfilled vacancies related to safety alone, how the Railways can ensure a safe and secure journey? The improvement of safety systems has not matched the railways incessant expansion.

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Evidence from across the country shows a weak banking system trying to cope with this demonetization emergency and failing. The limits on deposits and exchanges are ridiculous. Unless those are lifted massively, this liquidity crunch is going to drag down the economy.

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भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रयासों को अमलीजामा पहनाने के लिए ये जरूरी है कि ऐसे प्रयासों को निष्पादित करने वाले अधिकारी, कर्मचारी भी भ्रष्ट नहीं हों. क्या हो रहा है नोटों के बदले जाने के सरकारी फैसले के मामले में? आम जनता घंटों लंबी कतारों में खड़ी हो कर खाली हाथ लौटने को मजबूर है. रोजमर्रा की जरूरतों का पूरा करना माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने से भी कठिन साबित हो रहा है. वहीं रसूखदारों, पहुँच वालों, सही मायनों में कालाधन रखने वालों को कोई परेशानी नहीं हो रही.

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चर्चा एनकाउंटर पर नहीं सुरक्षा में हुई बड़ी चूक पर होनी चाहिए थी हल्ला मारे गए कथित आतंकियों के कपड़ों पर नहीं शिवराज सरकार के भ्रष्ट जेल अधिकारियों पर होना चाहिए था बिना जेल-प्रशासन की मिलीभगत के आठ लोगों का त्रिस्तरीय सुरक्षा-घेरे को तोड़कर आठ किलोमीटर दूर तक पैदल पहुँच जाना संभव है क्या ? सवाल उठाना ही है तो शिवराज सरकार के गृह-मंत्री के पल-पल बदलते विरोधाभासी बयानों पर उठाईए

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यूपी में समाजवादी पार्टी में बिखराव का फायदा सीधे तौर पर काँग्रेस और बहुजन समाज पार्टी को मिलेगा.... सबसे बड़ा निर्णायक वोट बैंक मुसलमानों का होगा... प्रदेश का मुस्लिम मतदाता अपने वोटों का विभाजन करने के मूड में नहीं है… भाजपा-मोदी ब्रिगेड को सत्ता से मरहूम करने के उद्देश्य से वो जिस तरफ भी वोट करेगा एकमुश्त करेगा...

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दशकों से सांसदों को जनता के बीच जाने और उनकी समस्याओं से रूबरू होने की बातें होती आ रही हैं, लोकतन्त्र का तकाजा भी यही है l सुनने-सुनाने में अच्छी लगने वाली इन बातों का बाकियों पर क्या असर हो रहा है ये तो मैं नहीं जानता लेकिन हमारे पटना साहिब के सांसद श्री शत्रुघ्न सिन्हा पर इसका कोई असर होता हुआ नहीं दिखता है, शायद इन सब चीजों से से ऊपर की 'चीज़' हैं जनाब!!

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नीतीश कुमार जी, राज्य द्वारा बनाये गए कानून और विधान केवल जनता के लिए ही नहीं अपितु राजा के लिए भी होने चाहिएं..

बिहार के गोपालगंज में जहरीली शराब से हुई १३ मौतों और शराबबंदी लागू किए जाने से लेकर अब तक हुई ३० मौतों ने नीतीश जी और उनकी सरकार के तमाम वैसे दावों की पोल खोल कर रख दी है जिसमें अब तक ये दावा किया जाता रहा है कि बिहार में शराबबंदी प्रभावी रूप से लागू है.

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बिहार में जनहित से जुड़े मुद्दे भी 'व्यक्ति-विशेष' के अंह की भेंट चढ़ रहे हैं, जनभावनाओं को हाशिए पर धकेल दिया गया है l सरकार की कार्य-शैली पर जब प्रश्न उठता है तो नीतीश जी का जबाव होता है कि "भ्रम फैलाया जारहा है, लोग भ्रम में न फंसें, सब ठीक चल रहा है l"

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देश में दलित उत्पीड़न एक गंभीर मुद्दा है, खास तौर से उस स्थिति में जब सरकार ने आम जन से भय, भूख एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने का वायदा किया है। सिर्फ दलित उत्पीड़न की घटनाओं को देखा जाए तो पिछले दो वर्षो में दलितों की पिटाई, दलितों का समाजिक बहिष्कार, दलित महिलाओं के साथ बलात्कार, उनकी बेदखली आदि जैसी कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो बहुत ही शर्मनाक हैं।

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बिहार की सरकार काफी समय से नक्सलवाद को महज कानून और व्यवस्था की समस्या कह कर इसकी भयावहता का सही अंदाजा लगाने में नाकामयाब रही है l बिहार में भी इनकी (नक्सली) सत्ता के आगे राज्य सरकार बेबस है, औरंगाबाद का हालिया नक्सली हमला इसका ताजा- तरीन उदाहरण है l

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