२०१२ के विधान -सभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में २१९ सीटों पर चुनाव लड़ी थी नीतीश जी कीपार्टी जनता दल यूनाइटेड .... नतीजा क्या था?इसपर गौर फरमाने की जरूरत है ....

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शिक्षा के कारोबार का काला-धंधा देशव्यापी समस्या है, ये सिर्फ बिहार तक ही सीमित नहीं है l निःसन्देह ये दुःखद है कि हालिया टॉपर्स प्रकरणसे बिहार की बदनामी हुई है और बिहारजगहँसाई का पात्रबना दियागया हैl मगर ऐसा नहीं है कि ऐसा देश के किसी और राज्य में नहीं होता या नहीं हुआ है, अनेकों उदहारण हैं लेकिन उनको इतना तुल नहीं दिया जाता और ना ही उनको आधार बना कर वहाँ की मेधा पर सवाल खड़े किए जाते हैं l ऐसा क्यूँ? ...बिहार के प्रति पूर्वाग्रहया बिहार की मेधा से लगातार हर क्षेत्र में पिछड़ते जाने से उत्त्पन्न ढाह?

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कल राजद संसदीय दल की बैठक के बाद वरिष्ठ राजद नेताओं ने नीतीश कुमार को सीधे अपने निशाने पर लियाl संकेत कुछ अच्छे नहीं हैं नीतीश जी के लिए...

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सीवान में हुई पत्रकार राजदेव जी की हत्या के तार सीधे तौर से वर्षों से जेल में बंद अपराधी से नेता बने दुर्दांत शहाबुद्दीन से जुड़ते दिख रहे हैं l जेल में बंद रहने के बावजूद सीवान और इसके आस-पास के इलाकों में शहाबुद्दीन का नेटवर्क कभी भी कमजोर नहीं हुआ और अभी भी बेलगाम हो कर काम कर रहा है l विगत वर्षों में अनेकों हत्याएं शहाबुद्दीन से जुड़े गुर्गों ने बेख़ौफ़ हो कर की हैं l सुशासन के तमाम दावों के बावजूद जेल में बंद अपराधी सरगनाओं व् आपराधिक पृष्ठ-भूमि वाले नेताओं का तांडव बिहार में बदस्तूर जारी ही रहा है, ये सुशासन की सार्थकता पर बड़ा प्रश्न-चिन्ह है?

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आज हिन्दी साहित्य के ओज-पुरुष राष्ट्र कविरामधारी सिंह 'दिनकर' जी की पुण्य-तिथि है.... हिन्दी साहित्य की बात तो क्या भारत में साहित्य (किसी भी भाषा) की कोई भी चर्चा दिनकर जी की चर्चा के बिना अधूरी है. अजीब विडम्बना है दिनकर जी की कृतियों पर दशकों पहले से विदेशों में शोध हो रहे हैं, अनेकों विदेशी विश्वविद्यालयों व शोध-संस्थानों में 'दिनकर-चैपटर्स' हैं लेकिन अपने ही देश और अपनी ही मिट्टी बिहार में दिनकर जी की याद लोगों को सिर्फ जयंती व पुण्य-तिथि पर आती है l

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बिहार की राजधानी व दक्षिणी बिहार को उत्तर बिहार से जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण लिंक जर्जर गाँधी सेतू अब बिहार की जनता के लिए नासूर बन चूका है l किसी भी दिन ढह जाने की इस पुल की स्थिति और वर्षों से इस पर रोज लगने वाले महाजाम केंद्र व् राज्य सरकार एवं स्थानीय प्रशासन के तमाम प्रयासों व् दावों के बावजूद यथावत हैं l नीतीश जी के पिछले कथित सुशासनी १० साल के लम्बे कार्यकाल में भी इस पुल की मरम्मत के लिए केंद्र की सरकार के साथ समन्वय की न तो कोई सार्थक पहल हुई न ही इस पर नित्य लगने वाले जाम का सिलसिला ख़त्म हुआ l

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चंद दिनों पहले २३ मार्च को हरेक साल की भांति एक बार फिर लोहिया जयन्ती की रस्म-अदायगी पूरे देश में भाषणों और माल्यर्पणों के दौर के साथ संपन्न हुई । आज डॉ. लोहिया की प्रासंगिकता सिर्फ आयोजनों व् व्याख्यानों तक ही सीमित है । डॉ. लोहिया के सिद्धांतों को अमलीजामा पहनाने का साहस व् संकल्प न तो उनके 'कथित अनुयायियों' में है न ही बारम्बार उनका जिक्र करने वालों में

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अजीब विडम्बना है... आजादी के लगभग सात दशकों के बाद भीसामाजिक कुरीतियों और विषमताओं के उन्मूलन के अनेकों अभियानों के पश्चात भीकड़े क़ानूनों की मौजूदगी के बावजूद भी देश में दलित उत्पीड़न की घटनाएँ बदस्तूर जारी हैं l 

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जिस अपार बहुमत के साथ जनता ने नीतीश जी के नेतृत्व में एक और नयी सरकार को चुना है उससे स्पष्ट है कि जनता की अपेक्षाएं काफी बड़ी और बढ़ी हैं, उम्मीद है नीतीश जी भी इसे भली–भाँति समझ रहे होंगे l नीतीश जी की अगुवाई वाली सरकार को ये ध्यान रखना होगा कि “जब अपेक्षाएँ बड़ी होती हैं तो अंसन्तोष भी शीघ्र ही उभरता है l”

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