कल राजद संसदीय दल की बैठक के बाद वरिष्ठ राजद नेताओं ने नीतीश कुमार को सीधे अपने निशाने पर लियाl संकेत कुछ अच्छे नहीं हैं नीतीश जी के लिए...

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सीवान में हुई पत्रकार राजदेव जी की हत्या के तार सीधे तौर से वर्षों से जेल में बंद अपराधी से नेता बने दुर्दांत शहाबुद्दीन से जुड़ते दिख रहे हैं l जेल में बंद रहने के बावजूद सीवान और इसके आस-पास के इलाकों में शहाबुद्दीन का नेटवर्क कभी भी कमजोर नहीं हुआ और अभी भी बेलगाम हो कर काम कर रहा है l विगत वर्षों में अनेकों हत्याएं शहाबुद्दीन से जुड़े गुर्गों ने बेख़ौफ़ हो कर की हैं l सुशासन के तमाम दावों के बावजूद जेल में बंद अपराधी सरगनाओं व् आपराधिक पृष्ठ-भूमि वाले नेताओं का तांडव बिहार में बदस्तूर जारी ही रहा है, ये सुशासन की सार्थकता पर बड़ा प्रश्न-चिन्ह है?

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आज हिन्दी साहित्य के ओज-पुरुष राष्ट्र कविरामधारी सिंह 'दिनकर' जी की पुण्य-तिथि है.... हिन्दी साहित्य की बात तो क्या भारत में साहित्य (किसी भी भाषा) की कोई भी चर्चा दिनकर जी की चर्चा के बिना अधूरी है. अजीब विडम्बना है दिनकर जी की कृतियों पर दशकों पहले से विदेशों में शोध हो रहे हैं, अनेकों विदेशी विश्वविद्यालयों व शोध-संस्थानों में 'दिनकर-चैपटर्स' हैं लेकिन अपने ही देश और अपनी ही मिट्टी बिहार में दिनकर जी की याद लोगों को सिर्फ जयंती व पुण्य-तिथि पर आती है l

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बिहार की राजधानी व दक्षिणी बिहार को उत्तर बिहार से जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण लिंक जर्जर गाँधी सेतू अब बिहार की जनता के लिए नासूर बन चूका है l किसी भी दिन ढह जाने की इस पुल की स्थिति और वर्षों से इस पर रोज लगने वाले महाजाम केंद्र व् राज्य सरकार एवं स्थानीय प्रशासन के तमाम प्रयासों व् दावों के बावजूद यथावत हैं l नीतीश जी के पिछले कथित सुशासनी १० साल के लम्बे कार्यकाल में भी इस पुल की मरम्मत के लिए केंद्र की सरकार के साथ समन्वय की न तो कोई सार्थक पहल हुई न ही इस पर नित्य लगने वाले जाम का सिलसिला ख़त्म हुआ l

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चंद दिनों पहले २३ मार्च को हरेक साल की भांति एक बार फिर लोहिया जयन्ती की रस्म-अदायगी पूरे देश में भाषणों और माल्यर्पणों के दौर के साथ संपन्न हुई । आज डॉ. लोहिया की प्रासंगिकता सिर्फ आयोजनों व् व्याख्यानों तक ही सीमित है । डॉ. लोहिया के सिद्धांतों को अमलीजामा पहनाने का साहस व् संकल्प न तो उनके 'कथित अनुयायियों' में है न ही बारम्बार उनका जिक्र करने वालों में

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अजीब विडम्बना है... आजादी के लगभग सात दशकों के बाद भीसामाजिक कुरीतियों और विषमताओं के उन्मूलन के अनेकों अभियानों के पश्चात भीकड़े क़ानूनों की मौजूदगी के बावजूद भी देश में दलित उत्पीड़न की घटनाएँ बदस्तूर जारी हैं l 

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जिस अपार बहुमत के साथ जनता ने नीतीश जी के नेतृत्व में एक और नयी सरकार को चुना है उससे स्पष्ट है कि जनता की अपेक्षाएं काफी बड़ी और बढ़ी हैं, उम्मीद है नीतीश जी भी इसे भली–भाँति समझ रहे होंगे l नीतीश जी की अगुवाई वाली सरकार को ये ध्यान रखना होगा कि “जब अपेक्षाएँ बड़ी होती हैं तो अंसन्तोष भी शीघ्र ही उभरता है l”

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समाजवादके भगवा-संस्करण के साथ भाजपा ने बिहार में महागठबंधन को एक झटका तो जरूर दे दियाहै l विरोधाभास की खोखली राजनीति में विरोधियों में खुजलीपैदा करना भी रणनीति काअहम हिस्सा होता है और इस फ्रंट पर भाजपा सफल होती दिख रही है l

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अगर जुटी हुई 'भीड़' चुनावी नतीजों के आक्लन का  पैमाना है तो कल दिनांक ३०.०८.२०१५ को  पटना में महागठबंधन (राजद–काँग्रेस–जदयू) के द्वारा आयोजित स्वाभिमान रैली की भीड़ आसन्न विधानसभा चुनावों के संदर्भ में एनडीए, विशेषकर भाजपा, के लिए कुछ अच्छे संकेत देती हुई नहीं दिखती है l

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आजसे पाँच दिनों पहले, रविवार ९ अगस्त २०१५ को, गया की रैली में बिहार के पिछले २५वर्षों के शासनकाल कोजंगलराज, कुशासन और बिहार की बदहाली का कारण बता करप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो भाजपा की प्रदेश इकाई को सांसत में ही डाल दिया है l

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The ongoing monsoon session once again proved that there is arrogance in the BJP, their floor management is extremely poor and they have failed to accept that they do not have a majority in the Rajya Sabha.

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The gap between the emerging narrative of a new politics and the actual behaviour of political parties suggests that the actual situation is thus far more nuanced than many assume. What has been happening on the ground (or rather in the closed rooms where political deals are struck) shows that the actual players in the political game are far more sceptical than assorted pundits about the inevitability of a new politics liberated from the bonds of identity, political dynasty, criminality, caste and corruption.

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जहर पीने की बात तो लालू जी ने की थी लेकिन अब नीतीश जी उनको ही विषधर बता रहे हैंl ऐसे में इस 'जहरीले गठबंधन' का हश्र क्या होने वाला है सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है l

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