"Sab ka Saath Sab ka Vikas" sounds hollow, if things do not improve all around. There is nothing significant being done in the one-year tenure of the Modi government. Everyone’s asking the question on the much-hyped "Achche Din" promise: "Where are the achche din?"

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कल जब दिल्ली के ‘मुख्य-संतरी’ और आम आदमी नौटंकी पार्टी’ के संचालक श्री अरविंद केजरीवाल को जनता का रिपोर्टर’ कार्यक्रम (प्री-रिकोर्डेड) में टीवी पर बोलते सुना तो मुझे पक्का विश्वास हो गया कि अब कलयुग खत्म हो चुका है और भट्ठ-युग’ अपने परवान पर है l

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दो दिनों पहले पटना में एक समारोह में भाजपा नेता श्री सुशील कुमार मोदी के संसदीय जीवन के २५ साल पूरे होने पर एक अभिनंदन समारोह का आयोजन खुद सुशील मोदी के द्वारा ही आयोजित किया गया चंद दिनों पहले एक ऐसा ही आयोजन नीतीशजी के ३० साल के संसदीय जीवन के उपलक्ष्य में नीतीश जी के चहेते शैवाल गुप्ता की कथित समाजसेवी संस्था आद्री के परिसर में आयोजित किया गया था l

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पिछले साल २५ दिसम्बर को स्वर-कोकिला लता दीदी ने अटलजी को उनके जन्मदिवस व भारत-रत्न से विभूषित किए जाने की घोषणा पर अपने बधाई संदेशमें सियासत का संतकहकर संबोधित किया था l इस कड़ी को ही आगे बढ़ाते हुए मेरामानना है कि बिल्कुल औघड़दानी" हैं अटल जी, जहाँ भी गए उसको ही अपना लिया , वहींमें रम गए, वहीं के लोगों को अपना बना लिया

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कभी 'खींचो न कमान न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो' कहने वाले अकबर इलाहाबादी ने अख़बारों से मोहभंग होने के बाद उन पर व्यंग्य करते हुए कहा था कि 'मियां को मरे हुए हफ्ते गुजर गए, कहते हैं अख़बार मगर अब हाले मरीज अच्छा है’ l

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Today Congress boycotted the house and the proceedings on the farce Snoop Case; it was a clear case of a dynastic-centric party wasting the valuable time of parliament on a non-issue. In fact, Congress is trying too hard to cover its embarrassment on Rahul’s absence from the country and the House during the all important budget and the Land Acquisition sessions.

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आज दोपहर बिहार के 'सरकारी उपवासकार्यक्रम-स्थल पर जाने काथोड़ी देर केर लिए ही सही, 'पुण्यमैंने भी किया. उपवास-स्थल के बाहर तो मेले सा दृश्य थासरकारी अमला भी पूरी तरह चौकस थाएम्बुलेंसें भी दिखीं और मुस्तैद डॉक्टरों का जत्था भी. सब के सब बिल्कुल 'अलर्ट' , हों भी क्यूँ ना रोज 'जम कर खाने वालेआज 'उपवासपर जो थे.

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नीतीश जी की कथनी व करनी में विरोधाभास का पुट ढूँढने के लिए कोई बहुत ज्यादा माथा-पच्ची व मशक्त नहीं करनी पड़ती l नीतीश जी का पूरा राजनीतिक सफर व मुख्य-मंत्री के रूप उनका कार्यकाल विरोधाभासों से पटा पड़ा हैl

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"अन्ना की अपनी सीमितताएँ हैं, उनकी अपनी कोई सोच या कोई स्पष्ट-विजन नहीं है"l मुझे तो पूरा विश्वास है कि भूमि अधिग्रहण कानून की पेचीदगियों से अन्ना पूरी तरफ से वाकिफ भी नहीं होंगे l

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