माँझी-नीतीश के बीच कुर्सी की 'हाई-वोल्टेज' लड़ाई में नीतीश जी लगातार ये कहते दिख रहे हैं "बिहार में संवैधानिक संस्थाओं वपरम्पराएँ मज़ाक बन कर रह गई हैं" l उनका इशारा किस संवैधानिक संस्था की ओर है इसे, नीतीश-माँझी प्रकरण के संदर्भ में समझना 'रॉकेट-साइन्स' के गूढ विज्ञान जैसा जटिल भी नहीं है, लेकिन नीतीश जी के मुँह से ऐसी बात सुन कर हँसी आना, हतप्रभहोना तो लाजिमी ही है l

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दिल्ली में आम आदमी पार्टी कीइस सुपर लैंड-स्लाईड विक्ट्रीसे ये स्पष्ट है कि जनता के मिजाज और नब्ज को केजरीवाल और उनकी टीम ने बाकी सबोंसे बेहतर भाँपा l इस सबमें केजरीवाल विरोधी पार्टियाँ भी हैं, मीडिया का वो तबका भी है जो आम आदमी पार्टी की जीत का आक्लन तो कर रहा था लेकिन उसे भी ऐसीजीत की उम्मीद नहीं थी, मीडिया का वो तबका भी हैजिसे आम आदमी पार्टी की जीत का संशय था और संशय की वाजिब वजहें भी थीं, इसमें मैं भी शामिल था l

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बिहार में पिछले नौ सालों से ऊपर के ‘सुशासनी शासनकाल में और कुछ तो फला-फूला नहीं ही लेकिन राजनीति, सत्ता और सरकारी महकमों के संरक्षण में शराब के वैध-अवैध कारोबार ने बेशक नई ऊंचाईयाँ हासिल कीं। आज आलम ये है कि शहर के गली-मुहल्लों से लेकर सूबे के ग्रामीण इलाकों तक में अगर कोई एक चीज सबसे सुलभता से उपलब्ध है तो वो शराब ही है।

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प्रदेश की राजधानी पटना समेत पूरे प्रदेश में शीतलहर का कहर जारी है । लगातार गिरते पारे और तेज पछुवा हवा ने लोगों को घरों में कैद कर दिया है। खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर गरीब-बेसहारा लोगों के लिए ठंड जानलेवा साबित हो रही है।

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लोकसभा चुनाव व उसके उपरांत हरियाणा व महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में जिस कदर नरेंद्र मोदी के आह्वान पर भाजपा को लोगों ने अपना समर्थन दिया और अब झारखण्ड एवं जम्मू-कश्मीर के एक्ज़िट-पोल जैसे नतीजों की ओर इशारा कर रहे हैं उसे देख कर ये कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि भारतीय मतदाताओं में मोदी की स्वीकार्यता बाकी सबों पर भारी पड़ रही है l

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ये ज्ञातव्य है कि बिना किसी स्पष्टविजन के दो बार संसदीय राजनीति में कथित तीसरे मोर्चे की सरकार तो बनी लेकिन स्वहितव जोड़तोड़ की राजनीति के परिणामस्वरूप आपस में हुई राजनीतिक वर्चस्व की टकराहटके कारण कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी सवाल ये है कि वर्तमानपरिदृश्य में जिस तरह मोदी बनाम दूसरे सबका समीकरण उभर कर आ रहा है, उसमें किसीवैकल्पिक फ्रंट की कितनी गुंजाईश बैठ पाएगी?

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हाल में बिहार के सारे अखबारों ने नौ सालों केकथित सुशासनी सरकार के रिपोर्ट-कार्डको जिस तरीके से परोसा और जिस तरह से वोनीतीश जी के चुनावीअभियान की मुहिम सम्पर्क-यात्राको परोस रही है वो अपने आप हीनीतीश जी की सरपरस्ती वाले सुशासन के मीडिया-मैनेजमेंट की सच्चाई को बयाँ करता हैपढ़ने के बाद यही लगता है कि मीडिया अपनी आलोचक और प्रहरी की भूमिका को पूर्ण रूप से भूलकर दरबारीकी भूमिका बखूबी निभा रहा है।

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एक अजीबो-गरीब हताशा का माहौल कायम है बिहार के सत्ताधारी दल जनता दल (यूनाइटेड) में, विधान सभा चुनाव नजदीक हैं लेकिन संगठन से जुड़े समर्पित लोगों में कोई उत्साह नहीं दिखता। संगठन से जुड़े लोगों और जनता से जुड़े चंद नेताओं को नजरअंदाज कर जब से नीतीश जी नेअपनी ना समझ में आने वाली राजनीतिक रणनीति के साथ पार्टी को चलाने का फैसला किया हैतभी से एक निराशा का माहौल कायम है जनता दल (यूनाइटेड) में।

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नौ सालों के बाद सुशासनी-सरकार को सूबे के सबसे बड़े हस्पतालपीएमसीएच की चिंता सताने लगी है, वो भी तब जब हालिया पटना हादसे के बाद इस हस्पतालकी बदहाली से खुद मुख्यमंत्री को रूबरू होना पड़ा.

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हादसों के बादअधिकारियों के तबादले की परम्परा सरकारी अमले की खामियों पर पर्दा डालने की कवायदका काफी पुराना 'चोंचला' है. ऐसी कवायदों से प्रशासनिक तंत्र में कोई आमूल-चूलपरिवर्तन ना तो पहले कभी हुआ है और ना भविष्य में होने वाला है. ऐसे तबादलों कोअधिकारीगण 'रूटीन-अफेयर' मानते हैं. अगर सरकारें वास्तविकता में गंभीर होतींतो सिर्फ तबादलों का दिखावा नहीं होता अपितु दोषी व सीधे तौर पर ज़िम्मेवारअधिकारियों को कानून के तहत सजा सुनिश्चित करवाती.

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