हाल में बिहार के सारे अखबारों ने नौ सालों केकथित सुशासनी सरकार के रिपोर्ट-कार्डको जिस तरीके से परोसा और जिस तरह से वोनीतीश जी के चुनावीअभियान की मुहिम सम्पर्क-यात्राको परोस रही है वो अपने आप हीनीतीश जी की सरपरस्ती वाले सुशासन के मीडिया-मैनेजमेंट की सच्चाई को बयाँ करता हैपढ़ने के बाद यही लगता है कि मीडिया अपनी आलोचक और प्रहरी की भूमिका को पूर्ण रूप से भूलकर दरबारीकी भूमिका बखूबी निभा रहा है।

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एक अजीबो-गरीब हताशा का माहौल कायम है बिहार के सत्ताधारी दल जनता दल (यूनाइटेड) में, विधान सभा चुनाव नजदीक हैं लेकिन संगठन से जुड़े समर्पित लोगों में कोई उत्साह नहीं दिखता। संगठन से जुड़े लोगों और जनता से जुड़े चंद नेताओं को नजरअंदाज कर जब से नीतीश जी नेअपनी ना समझ में आने वाली राजनीतिक रणनीति के साथ पार्टी को चलाने का फैसला किया हैतभी से एक निराशा का माहौल कायम है जनता दल (यूनाइटेड) में।

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नौ सालों के बाद सुशासनी-सरकार को सूबे के सबसे बड़े हस्पतालपीएमसीएच की चिंता सताने लगी है, वो भी तब जब हालिया पटना हादसे के बाद इस हस्पतालकी बदहाली से खुद मुख्यमंत्री को रूबरू होना पड़ा.

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हादसों के बादअधिकारियों के तबादले की परम्परा सरकारी अमले की खामियों पर पर्दा डालने की कवायदका काफी पुराना 'चोंचला' है. ऐसी कवायदों से प्रशासनिक तंत्र में कोई आमूल-चूलपरिवर्तन ना तो पहले कभी हुआ है और ना भविष्य में होने वाला है. ऐसे तबादलों कोअधिकारीगण 'रूटीन-अफेयर' मानते हैं. अगर सरकारें वास्तविकता में गंभीर होतींतो सिर्फ तबादलों का दिखावा नहीं होता अपितु दोषी व सीधे तौर पर ज़िम्मेवारअधिकारियों को कानून के तहत सजा सुनिश्चित करवाती.

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पटना में रावण-दहन के उपरान्त मची भगदड़ के बाद जैसी कुव्यवस्था औरबदइंतजामी देखने को मिली वो सुशासनी सरकार के बहुप्रचारित आपदा प्रबंधन के मुँह पर 'तमाँचाही है. तीन साल पहले छठ पूजा के अवसर पर ऐसी ही परिस्थितियों में ऐसाही हादसा हुआ था और तब भी सरकार की व्यवस्था की पोल खुल गई थी लेकिन फिर भी सरकारचेती नहीं.

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अपने ही 'पोस्टमें गोल मारने के बाद किसी खिलाड़ी की पीठथप-थपाई जाती है क्या कल मेडीसन-स्क्वायर के बाहर मशहूर पत्रकार राजदीप सरदेसाई के साथ अप्रवासी भारतीयों ने राजदीप के द्वारा देश के प्रधामन्त्री की छवि कोधूमिल करने के उद्देश्य से पूछे गए विद्वेषपूर्ण सवालों के उपरान्त जैसा सलूक किया उससे फिर से एक बार ये सवाल उठता है कि "मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रताके नाम पर हस्तक्षेप की कितनी 'दूरीदी जानी चाहिए?"

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१९९० के दशक में लालू राज के शुरुआती दिनों (जिसे कालान्तर में जंगल-राज के विशेषण से नवाजा गया) में बिहार में जब सत्ता की शह पर आपराधिक चरित्र के लोगों वबाहुबलियों के तांडव की शुरुआत हुई थी तो सर्वप्रथम जो चेहरा अपने कारनामों के कारण सबसे चर्चित हुआ था वो पप्पू यादव का ही था l

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केंद्र – सरकार ने पूरे देश में १०० स्मार्ट-सिटी विकसितकिए जाने की घोषणा की है भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के सचिव का इसीसंदर्भ में बिहार का दौरा सोमवार (१५.०९.२०१४) को प्रस्तावित है सूत्रों की मानेंतो बिहार के तीन शहरों पटनागया और भागलपुर का चयन इस प्रयोजन हेतू सुनिश्चित हैलेकिन बिहार सरकार ११ शहरों के लिए अपनी दावेदारी रख रही है l

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"Poverty is a curse, must be eradicated" says नीतीश जी....

ये तो हम सबजानते हैं कि गरीबी अभिशाप है ....बेहतर होता आप ये बताते कि आपकी सरपरस्ती के नौसालों के शासन में इसके उन्मूलन के लिए आपने और आपकी सुशासनी सरकार ने कौन-कौन सेसार्थक पहल किए और उनका प्रतिफल बिहार की गरीब जनता को क्या मिला?

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भारत से प्रतिवर्ष औसतन सवा लाख लोग हज करनेके लिए मक्का मदीना जाते हैं। इस्लामी आदेशानुसार हज यात्रा पर उसी इस्लामी-धर्मावलम्बी को जाना चाहिएजो अपने जीवन के सभी पारिवारिक दायित्वों से मुक्त होचुका हो और जिसके पास अपनी गाढ़ी कमाई हो और हज के निमित्त वो उसी कमाई को खर्च करे l

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