सार्वजनिक मंचों पर और विशेषकर जब चुनाव नजदीक आते हैं तो नीतीशकुमार "जाति-बंधन तोड़ने वाले"के रुप में अपनी 'छद्यम पहचानबनाने को लालायितदिखते हैं और अपने समालोचकों को उनकी सच बयानी पर आड़े हाथों भी लेते हैं l

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सामान्य रहन-सहन में भी एक प्रचलन काफी आम होता है कि लोग अपने drawing room को काफी साफ-सुथरा और सजा-संवार के रखतेहैं भले ही घर के बाकी हिस्से अस्त-व्यस्त ही क्यूँ ना हों किसी प्रदेश की राजधानी भी उस प्रदेश की drawing room सरीखी ही होती है और इसका मुजाहिरा देशके गरीब से गरीब व अति-पिछड़ा राज्यों की राजधानियों में होता है l

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बिहार भाजपा की प्रदेश इकाई कैसे अंतर्विरोधोंअंतर्कलह व गुटबाजी से जूझ रही हैइसका जिक्र मैं लोकसभा चुनावों के पहले से अपने आलेखों व विश्लेषणों में करता आरहा हूँ लोकसभा चुनावों तक को नमो के नाम पर किसी तरह से इस आश्वासन के साथ इस परपर्दा डाला गया कि चुनावों के बाद हल अवश्य ही ढूँढा जाएगा लेकिन स्थिति यथावत हीरही और जिसका खामियाजा १० सीटों वाले उपचुनाव में पार्टी को भुगतना भी पड़ा l

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बिहार के उप-चुनावों के नतीजों के बाद सोशल मीडिया व मीडिया के अन्य माध्यमों पर हार को स्वीकारने और उसकी समीक्षा करने की बजाए सच्चाई से मुँह मोड़ते हुए भाजपा के चन्द नेतागण व समर्थक ये कहते हुए लगातार देखे जा रहे हैं कि भाजपा ने अकेले दम पर लालू-नीतीश-काँग्रेस गठबंधन का मुक़ाबला किया और चार सीटें हासिल कीं l”

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भारत को स्वतंत्र हुए भी सड़सठ साल हो गए हैं और साथ में भारतीय संसद भीसाठ साल से ऊपर की हो गई है। भारतीय संसद पर जिस तरह अब तक लिखा गया हैदिखायागया है और जिस तरह उसे महिमामंडित किया गया हैविशेषकर राजनीतिक तबके कीठकुर-सुहाती करने वाले स्वयंभु-पंडितों के द्वाराउसे देख कर मशहूर व्यंग्यकारहरिशंकर परसाई जी का कहा हुआ याद आता है कि इस देश के बुद्धिजीवी सब शेर हैंपरवे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं।

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बिहार के २३ जिले सूखेकी चपेट में आ चुके हैं और सरकार अभी नींद से पूरी तरह जागी भी नहीं है मुख्यमंत्री अपने गाँव और गृह-जिले के विकास से आगे देख नहीं पा रहे हैंचंददिनों पहले ही मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर ये कहा कि अपने गृह-जिले और उससेसटे जिले जहानाबाद का विकास उनकी प्राथमिकता हैl

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लालू जी... इस मण्डलकमण्डल की राजनीति सेअब तो ऊपर उठिए  l अब तक तो आप और आप जैसे अन्य किसी ना किसी रूप में यही मण्डलकी राजनीति करते आ रहे थे और इसका परिणाम भी आप भुगत रहे हैंजनता ने आप लोगों कोहाशिए पर डाल दिया है , यहाँ तक की कमण्डल वालों’ ने भी कमण्डल का त्याग करअपनी राजनीति की दिशा बदली क्यूंकी कमण्डल की राजनीति’ के दुष्परिणाम वो भुगत चुकेथे और अपनी दिशा बदलने में ही उन्हें अपना भला नजर आया l

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आज पूरा उत्तर-पूर्व भारत बिजली की संकट से जूझ रहा हैबिहार में भी स्थिति भयावहहै स्वाभाविक भी है क्यूंकी बिहार में सुचारु रूप से काम कर रही बिजली उत्पादन कीकोई भी इकाई नहीं है बिहार में नयी केन्द्रीय परियोजनाओं से उत्पादन की शुरुआत मेंभी अभी देरी है और राज्य सरकार की उत्पादन - इकाईयाँ भी बदहाली और बंदी की कगार परही हैं l

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बिहार में इंसेफेलाइटिस का कहर हरेक साल की तरह इस साल भी जारी है बिहार सरकार की मानें तो अब केवल ४०-५० मौतें हुई हैं जबकि मुजफ्फरपुर और गया के भिन्न इलाकों में मौजूद पत्रकार मित्रों व सूत्रों के अनुसार संख्या इससे कहीं ज्यादा है लगभग १०० के करीब l

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नैतिकता की आड़ में इस्तीफे की नौटंकी का सच नैतिकता कीदुहाई देने वाले नीतीश खुद विरोधाभास की राजनीति के द्योतक हैं। यदि नैतिकता केआधार पर त्यागपत्र देना ही था तो उन्हें उस वक्त ही दे देना चाहिए था जब उन्होंनेभाजपा से गठबंधन तोड़ा था क्यूँकी जनमत सिर्फ उनके अकेले के लिए नहीं था ।

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