बिहार में आतंकवाद का फलना-फूलना सामाजिक परिवेश से तालुक्क नहीं रखता हैसामाजिक परिवेश में समरसता की कौन सी परिभाषा आतंकवाद के पोषण और अनदेखी की बात करती हैदोनों भिन्न मूद्दे हैं l

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देश में कई सुधारों के लिए अग्रणी बिहार का पतन आजादी के कुछ सालों बाद ही शुरूहो गया था । लेकिन 1989 में गैर कांग्रेसवाद सामाजिक न्याय के नाम पर और मण्डलकमीशन के रथ पे आरूढ़ हो कर सत्ता के सिंहासन पर आए लालू प्रसाद यादव जी और उनकेकुनबे ने बिहार की हालत बद से बदतर कर दी ।

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नीतीश खुद को विकास पुरुष’ के रूप में चाहे जितना पेश करें लेकिन उन्होंने विकास का कोई नयाज्यादा समावेशीऔर टिकाऊ मॉडल नहीं पेश किया है। उनकी विकास नीति किसी भी रूप में केन्द्र की यूपीएसरकार से अलग नहीं है।

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चलते-फिरते उठते-बैठतेखाते-पीतेसोते -जगाते केवल अल्पसंख्यकों के हिमायतीऔर रहनुमा बनने का दिखावे करने वाले नीतीश कुमार जी से बिहार के अल्पसंख्यकों को येसवाल जरूर पूछना चाहिए कि -

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बिहार में विकास पर हावी जाति की राजनीति बिहार में अहमराजनीतिक मुद्दों की बात की जाए तो जातिवाद बहुत ही हावी हैहर पार्टी एक खासजाति को साथ लेकर चलती है और ज्यादातर मामलों में उसी जाति को सहयोग देती नजर आतीहै ऐसा यहाँ एक पार्टी नहीं बल्कि सभी पार्टियां करती हैं l

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सुशासनी रिपोर्ट-कार्ड और बिहार की मीडिया हाल में बिहार के सारे अखबारों ने आठ सालों के सुशासनी रिपोर्ट-कार्ड” को जिस तरीके से परोसा वो अपने आप ही सुशासन के मीडिया-मैनेजमेंट की सच्चाई को बयाँ करता हैपढ़ने के बाद यही लगा है कि मीडिया अपनी आलोचक और प्रहरी की भूमिका को पूर्णरूप से भूलकर “दरबारी” की भूमिका बखूबी निभा रहा है l

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समग्र विकास का दावा छलावा नहीं तो और क्या हैसामाजिक समीकरणों से सत्ता कोसाधने की कोशिश कोई स्थायी नतीजे नहीं दे सकतीबल्कि एक ऐसी राजनीतिक दिशा कानिर्माण करती है जिसमें जनता को "सताया" ज्यादा जाता है और जनता की "सेवा " कम कीजाती हैआज यही हो रहा है बिहार में

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