धिक्कार है ऐसी सरकार और उसके पाखंडी ‘जन-रहनुमाओं' पर

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पटना में रावण-दहन के उपरान्त मची भगदड़ के बाद जैसी कुव्यवस्था औरबदइंतजामी देखने को मिली वो सुशासनी सरकार के बहुप्रचारित आपदा प्रबंधन के मुँह पर 'तमाँचाही है. तीन साल पहले छठ पूजा के अवसर पर ऐसी ही परिस्थितियों में ऐसाही हादसा हुआ था और तब भी सरकार की व्यवस्था की पोल खुल गई थी लेकिन फिर भी सरकारचेती नहीं.

 

कल हादसे के बाद जैसी अफरा-तफरी और बदइंतजामी का माहौल हादसे की जगहसे लेकर पीएमसीएच तक देखने को मिला उसे देखकर ये साफ जाहिर था सरकार की नजर में आमलोगों की जान की कीमत भेड़-बकरियों से भी बदतर है. पटना में रावण-दहन के दौरानलाखों की भीड़ दशकों से जुटती और इससे हर कोई वाकिफ है. बावजूद इसके प्रशासन कीतरफ से किसी भी तरह के हादसे के निबटने की कोई माकूल व्यवस्था ना तो पहले कभी कीजाती रही है ना ही कल भी किसी तरह के पुख्ता -इंतजामात थे.

गांधी मैदान मेंमौजूद पूरा सुशासनी अमला वीआईपीओं की तीमारदारी और सुरक्षा में जुटा था.कुव्यवस्था का आलम तो ये था कि इतनी भीड़ की मौजूदगी के बावजूद गाँधी मैदान मेंप्रवेश व निकासी के लिए एक्जिबिशन रोड साईड में बना बड़ा गेट बंद था. पूरे गाँधीमैदान इलाके में एम्बुलेंसों की कोई तैनाती प्रशासन के द्वारा नहीं की गई थी. हादसे के बाद एम्बुलेसों को ढूँढने व राहतकार्यों में लगाने का काम शुरू कियागया. गाँधी मैदान के बाहरी इलाकों में जिधर से भीड़ का आना और जाना होता है वहाँ नातो पुलिस-प्रशासन की कोई मौजूदगी थी और ना ही पर्याप्त लाईट एवं पब्लिक-एड्रेससिस्टम की कोई व्यवस्था प्रशासन के द्वारा की गई थी. अगर ऐसी कोई व्यवस्था होती तोनिःसन्देह मरने वालों के संख्या काफी कम होती.

पीएमसीएच में तो हमेशा की तरहबदइंतजामी अपने चरम पर थी. घंटो तक तो डॉक्टरों की खोज ही जारी थी. घायलोंको ज़मीनों पर लिटाया जा रहा था, बिना कोई साफ-सफाई किए जख्मों पर मरहम-पट्टी कियाजा रहा था और टाँके लगाए जा रहे थे, घायल खुद अपने हाथ में ही स्लाईन की बोतलेंथामे नजर आ रहे थे, और प्रशासन घायलों की मदद करने की बजाए मीडिया को रोकनेमें लगा हुआ था.कैमरा देखते ही पुलिस वाले ऐसा बर्ताव कर रहे थे मानों कोई बड़ाअपराधी दिख गया हो. मोर्चुयरी में तो लाशों के साथ ऐसा सलूक किया जा रहा थावैसा बूचड़खानों में देखने को मिलता है. एक-पर एक लाशें फेंकी हुई दिखीं.पीएमसीएच में ही मौजूद हादसे के कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि मरने वालों कीसंख्या सौ-सवा सौ से कम नहीं है. उनका कहना था कि अनेकों लाशों को एम्बुलेंसोंमें लादकर गंगा की तरफ पुलिस निगरानी में ले जाया गया है.

अगर ये सच है तो धिक्कारहै ऐसी सरकार और उसके पाखंडी 'जन-रहनुमाओं' पर

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