किसका दामन ज्यादा दागदार है ये सब जानते हैं

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हादसों के बादअधिकारियों के तबादले की परम्परा सरकारी अमले की खामियों पर पर्दा डालने की कवायदका काफी पुराना 'चोंचला' है. ऐसी कवायदों से प्रशासनिक तंत्र में कोई आमूल-चूलपरिवर्तन ना तो पहले कभी हुआ है और ना भविष्य में होने वाला है. ऐसे तबादलों कोअधिकारीगण 'रूटीन-अफेयर' मानते हैं. अगर सरकारें वास्तविकता में गंभीर होतींतो सिर्फ तबादलों का दिखावा नहीं होता अपितु दोषी व सीधे तौर पर ज़िम्मेवारअधिकारियों को कानून के तहत सजा सुनिश्चित करवाती.

तबादला किए गए अधिकारियोंको एक जगह से हटकर दूसरे जगह पर पदस्थापित कर देना खुद में विरोधाभासी है जोअधिकारी एक जगह अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल रहा हो उसे दूसरी जिम्मेवारीदेना किस दृष्टिकोण से उचित है? इस का दूसरा पहलू भी विचारणीय है और अनेकोंअनुत्तरित सवालों को जन्म देता है. ऐसे मामलों से जुड़े अधिकारियों (जिनका तबादलाकर दिया जाता है) का कहना होता है कि "राजनीतिक सत्ता हमलोगों पर गैरजिम्मेवारीका दोष मढ़ कर हमलोगों को जनता के सामने दोषियों की भाँति प्रस्तुत कर देती है लेकिनक्या कभी राजनीतिक सत्ता व तबके ने 'अपनी' जिम्मेवारी तय कर 'अपने' को दोषी माना है ?"

पटना हादसे के संदर्भ में ही तबादले की राजनीति का हिस्सा बने एक अधिकारी नेनाम उजागर नहीं करने के अनुरोध के साथकहा कि "माना प्रशासनिक चूक हुई लेकिनक्या कोई हुक्मरानों' से भी ये कोई पूछेगा कि उस दिन पूरा प्रशासनिक अमला किसकी' तीमारदारी में जुटा था? हादसे के बाद जैसे समीक्षा बैठकों और जाँच का स्वांग सरकारमें बैठे लोग कर रहे हैं वैसा ही सरकार व मंत्री के स्तर से अगर किसी बड़े आयोजन केपूर्व किया जाने लगे तो शायद हादसे हों ही ना!! 'खाकी' पर दाग 'खादी' के कारणही लगता आया है और आगे भी लगता रहेगा. लेकिन किसका दामन ज्यादा दागदार है ये सबजानते हैं. हम किसकेइशारों पर नाचने को मजबूर हैं ये भी कोई बताने वाली बातहै क्या?"

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