जमूरे और मदारी तो रोज बदलते हैं लेकिन हम जहाँ हैं वहीं रहते हैं

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नौ सालों के बाद सुशासनी-सरकार को सूबे के सबसे बड़े हस्पतालपीएमसीएच की चिंता सताने लगी है, वो भी तब जब हालिया पटना हादसे के बाद इस हस्पतालकी बदहाली से खुद मुख्यमंत्री को रूबरू होना पड़ा.

बेबाकी से कहूँ तो पीएमसीएचप्रशासन ने तो सूबे के मुखिया को ही उसकी औकातबता दी. अब तक के सुशासनीशासन-काल में चंद अखबार और मेरे जैसे चंद लोग जब सरकार का ध्यान इस ओर खींचने कीकोशिश लगातार कर रहे थे तो उसमें सत्ताधारी दल के लोगों व उनके समर्थकों को विपक्षका हाथनजर आ रहा था जबकि सच तो ये है कि बिहार के विपक्ष ने भी कभी इस ओरदेखने या इसे दुरुस्त करवाने की कभी कोई पहल ही नहीं की.

बिहार का सबसे बड़ादुर्भाग्य तो ये है कि पक्ष हो या विपक्ष, किसी के पास जनसरोकर से जुड़े मुद्दों केलिए ना तो कोई गंभीर सोच है और ना ही समय. हो भी कैसे राजनीति की दुकान सजाएरखने की तुंगाफेरीसे फुर्सत मिले तब ना?

बिहार का राजनीतिक तबका तोबयानवीरोंसे पटा पड़ा है. दूर-दूर तक नजर दौड़ाने और माथा-पच्ची के बावजूदबिहार में एक भी जनप्रतिनिधि और राजनेता दिखाई नहीं देता है जिसके दिल में जनता केलिए रत्ती भर भी दर्द हो!

मैंने तो साल की शुरुआत में अपनी सचित्रात्मकरिपोर्ट में इस हस्पताल को नर्ककी संज्ञा दी थी जो उस समय भी किसी भी दृष्टिकोणसे गलत नहीं था और ना आज है. हालिया पटना हादसे वाले दिन भी मैं ने अपनीरिपोर्ट में पीएमसीएच की कुव्यवस्था और बदइंतजामी का जिक्र किया था और पटना के चंदअखबारों ने भी फिर से कुम्भ्कर्णी सरकारको जगाने की कोशिश जारी रखी. सरकारको कुछदिखा भी और सरकार हरकत में आई. पीएमसीएच से जुड़े चंद चिकित्सकों एवंपदाधिकारियों पर कारवाई की अनुशंसा की गई, सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए लेकिन कुछ भी बदलता हुआ नजर नहीं आ रहा.

हद तो तब हो गई जब रविवार कोमुख्यमंत्री की पीएमसीएच में मौजूदगी और अनेकों बुलावे के बावजूद हस्पताल केअधीक्षक ने आने तक की जहमत नहीं उठाई. जिस प्रदेश के मुखिया को उसका ही एकअदना अधिकारी तरजीह व तबज्जो ना दे उस प्रदेश की जनता तो भगवान भरोसेही है ना .....!!

पीएमसीएच में ही पदस्थापित एक वरीय चिकित्सक से मैंने कल जब इस बारे मेंपूछा तो उन्होंने ढिठाई से हँसते हुए कहा,"ऐसेऐसे 'जमूरे' देखते-देखते हमारेबाल सफ़ेद हो गए. जमूरे और मदारीतो रोज बदलते हैं लेकिन हम जहाँ हैं वहींरहते हैं."

इसके बाद मैंने आगे कुछ भी पूछना लाजिमी नहीं समझा और थोड़ी देर केलिए ये सोचने को विवश हो गया कि क्या बिहार की जनता के भाग्य-विधाता बने बैठे लोगसच में 'जमूरों' से ज्यादा कुछभी नहीं हैं?

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