कड़ाके की सर्दी में खुलती सरकारी इंतजामों की पोल

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प्रदेश की राजधानी पटना समेत पूरे प्रदेश में शीतलहर का कहर जारी है । लगातार गिरते पारे और तेज पछुवा हवा ने लोगों को घरों में कैद कर दिया है। खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर गरीब-बेसहारा लोगों के लिए ठंड जानलेवा साबित हो रही है।

पटना समेत प्रदेश के तमाम बाकी जगहों में इस कड़ाके की सर्दी से गरीबों को बचाने की सरकारी इंतजामों की पोल खुल रही है। ठंड से बेहाल लोग सड़कों पर ठिठुर रहे हैं। एक तरफ़ सर्दी तो अपना ही पूर्व का रिकॉर्ड तोड़ने की ओर आगे बढ़ रही है तो दूसरी तरफ़ रोजाना मजदूरी कर पेट भरने वाले गरीब बेसहारा लोगों के लिए सर्द रातें बड़ी चुनौती बन गई  

राजधानी पटना की ही बात की जाए तो हजारों लोग खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं । पटना जंक्शन, गाँधी मैदान, इनकम टैक्स चौराहा, पटना संग्रहालय के उत्तरी छोर चीना-कोठी का इलाका, राजेन्द्र नगर ओवर-ब्रिज, दिनकर गोलम्बर, अशोक राजपथ, मोईनुल हक स्टेडियम के समीप, मुस्सलहपुर हाट, बाजार समिति, अगमकुआँ, गुलाजारबाग, मालसलामी के इलाकों में, कँकड़बाग के मुन्ना चौक, बहादुरपुर ओवर-ब्रिज, मलाही-पक्कड़ी, पाटलीपुत्र स्पोर्ट्स-कॉम्प्लेक्स इलाके में, मीठापुर बस स्टैंड, करबिगहिया एवं अनिसाबाद इलाके में लोग खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर 

कुछ स्वयंसेवी संगठनों, कुछ निजी विद्यालयों के प्रबंधनों और कुछ प्रकाशन समूहों ने अलाव व कंबल वितरण की सराहनीय पहल तो की है लेकिन इतनी बड़ी आबादी के लिए वो नाकाफ़ी हैं, बिना समुचित सरकारी व्यवस्था के कुछ नहीं होने वाला है । सरकारी इंतजामों का ढ़िंढ़ोरा तो जरूर पीटा जा रहा है लेकिन ऐसे इंतजामात कहीं नजर नहीं आ रहे 

हैरानी की बात तो ये है कि लगभग तीस लाख की आबादी वाली राजधानी पटना में सरकार की तरफ से सिर्फ छः जगहों पर अलाव जलाने की व्यवस्था की सिर्फ घोषणा भर की गई । राजधानी पटना में सरकार ने लोगों को सर्दी से बचाने के लिए रैन बसेरा तो बनाए हैं लेकिन बस नाम के, इन रैन बसेरों में क्षमता से ज्यादा लोग सो रहे हैं। सरकारी रैन बसेरों की हालत ऐसी नहीं कि सारे बेघर और गरीब लोग उसमें आ 

पटना रेलवे स्टेशन पर यात्री स्टेशन के बाहर ऑटो-स्टैंड में आग तापते और चाय की चुस्की लेते नजर आते हैं, कोहरे की वजह से ट्रेनें घंटों लेट हैं और स्टेशन पर ठंड से बचने के इंतजाम नाकाफी, यहाँ भी अलाव की व्यवस्था रात की पाली में चलने वाले ऑटो-चालकों ने कर रखी 

राजधानी पटना में बड़ी तादाद में लोग फुटपाथों पर सोते हैं। इनके लिए प्रशासन की तरफ़ से सड़कों पर ना तो अलाव की पुख्ता व्यवस्था है ना ही सरकारी कंबल की । अधिकांश जगहों पर देखने को मिला कि किसी ने बोरे को तो किसी ने पोस्टर-बैनर को ही कंबल-चादर बना रखा है । इस हाड़ कँपा देने वाली ठँढ़ में खुले आसमान के नीचे रातें गुजारने वालों का कहना है कि "इस ठँढ़ से बचने के लिए वो जाएं तो जाएं कहाँ?” । एक साल पहले दलसिंगसराय से आया मुकेश साहनी व अररिया से आए जुबैर दिन में कड़ी मेहनत कर रिक्शा चलाते हैं और रात में हाड़ कंपा देने वाली ठँढ़ से मुकाबला करते हुए लगभग पूरी रात जग कर ही काट देते 

राजेन्द्र नगर टर्मिनल स्टेशन पर सर्द मौसम की मार रेलवे प्लेटफॉर्म और बाहर भी देखने को मिली । यहां लोग प्लेटफॉर्म पर कंबल ओढ़े पड़े थे । जाहिर है कोहरे की वजह से ज्यादातर ट्रेनें लेट हैं और कुछ रद्द कर दी गई हैं । राजेन्द्र नगर टर्मिनल स्टेशन के बाहर यात्रियों और इस स्टेशन के भरोसे अपनी जीविका चलाने वाले रिक्शा-चालकों के पास ठँढ़ में ठिठुरने के अलावा कोई चारा/उपाय नहीं दिखा । पटना के इनकम टैक्स चौराहे को सबसे भीड़-भाड़ वाला चौराहा माना जाता है । इस चौराहे से सरकार के लगभग सभी नुमाइंदे गुजरते जरूर हैं लेकिन उन्हें ठँढ़ में कांपते इस चौराहे के इर्द-गिर्द अपनी रातें काटने वाले बेबस लोगों की हालत दिखाई नहीं 

प्राप्त हो रही सूचनाओं के मुताबिक कमोबेश ऐसे ही हालात पूरे प्रदेश में है । प्रदेश के अनेकों रैन-बसेरों में दीवारें तो खड़ी हैं लेकिन इनकी खिड़कियों में पल्ले नहीं होने के कारण शीतलहर का हमला बदस्तूर हमला जारी है । अनेकों रैन-बसेरों की छतें व दीवारें रख-रखाव के अभाव के कारण दरक चुकी हैं और सोने या रहने के लिए किसी भी दृष्टिकोण से सुरक्षित नहीं हैं । ज्यादातर जगहों पर ठँढ़ से बचने के लिए लोगों को पुआल के भरोसे छोड़ दिया गया 

केन्द्रीय विद्यालय, कँकड़बाग के पास सड़क पर आग जलाकर ताप रहे रामकिशुन और उसके परिवार की हालत तो अत्यन्त ही दयनीय है । न कंबल, न रजाई और न ही बिस्तर । ऐसे में ठँढ़ से बचाव का एक ही जरिए बचा है , बस आग ताप कर रात गुजारो। राजधानी का ये आलम है तो आप प्रदेश के बाकी हिस्सों की परिकल्पना खुद कर सकते 

मिल रही खबरों के मुताबिक प्रदेश के दूसरे शहरों में भी सर्दी से बचाव के सरकारी उपाय नदारद ही हैं । कड़कड़ाती सर्दी से पूरे प्रदेश में अनेक लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी है । अब तक ठंड से प्रदेश भर में दर्जनों जानें जा चुकी हैं , लेकिन सरकार व उसका तंत्र एवं सरकार के मुख-पत्र की तरह काम रहे बिहार के अखबार इस पर ना जाने किन कारणों से चुप्पी साधे बैठे हैं । ठंढ से मरने वालों की सबसे ज्यादा संख्या गया जिले में है । नवादा, उत्तर बिहार के जिलों मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, वैशाली, पूर्वी व पश्चिमी चम्पारण, पूर्वी बिहार के भागलपुर, पूर्णिया, कटिहार, अररिया से लोगों के मौत की खबरें इन इलाकों में मौजूद सम्पर्क-सूत्रों से मिल रही हैं । मृतकों की संख्या में प्रतिदिन इजाफ़ा हो रहा है लेकिन सरकारी व मीडिया की संवेदनहीनता अपनी पराकाष्ठा पर 

अब बात की जाए पशुओं की, इस मौसम में आम व्यक्ति तो गर्म कपड़े, रजाई, कंबल और अलाव ताप कर अपना गुजारा येन-केन-प्रकारेण कर ले रहा है , परंतु शहरों में घूम रहे बेसहारा पशु ठिठुरते हुए गलियों, सड़कों पर घूमते अपनी जान गँवा रहे हैं । “जब आदमी की जान बचाने के ही उपाय नाकाफ़ी हैं तो पशुओं की परवाह कौन करता 

अत्याधिक ठँढ़ व कोहरे के कारण जन जीवन,रोजगार व कृषि -कार्य पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। जिसके कारण लोग अपने घरों में दुबके रह रहे हैं। खेत- खलिहान का कार्य बिलकुल ठप्प हो गया है। अति-आवश्यक कार्य से ही लोग अपने घरों से निकल रहे हैं। ठँढ़ के कारण दैनिक मजदूर भी काम की तलाश में नहीं निकल पा रहे हैं । तापमान में हो रही लगातार गिरावट से जन-जीवन अस्त -व्यस्त हो चुका है। ठँढ़ ने रोज़मर्रा की कार्यशैली पर ब्रेक ही लगा दिया है। अत्याधिक ठँढ़ का असर स्थानीय बाजार के व्यसाय को को प्रभावित कर रहा है । जिन बाजारों में भीड़ रहती थी वहाँ भी सन्नाटा पसरा 

ठंड से ठिठुरते एक पढे-लिखे ऑटो-चालक ने ठीक ही कहा “इन्द्र देवता’ का कोपभाजन बनना तो समझ से परे है लेकिन ‘सरकार देवता’ की उदासीनता पर सवाल तो खड़े होते ही हैं...”

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