नीतीश कुमार: "चलनी दूसे सूप को"

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माँझी-नीतीश के बीच कुर्सी की 'हाई-वोल्टेज' लड़ाई में नीतीश जी लगातार ये कहते दिख रहे हैं "बिहार में संवैधानिक संस्थाओं वपरम्पराएँ मज़ाक बन कर रह गई हैं" l उनका इशारा किस संवैधानिक संस्था की ओर है इसे, नीतीश-माँझी प्रकरण के संदर्भ में समझना 'रॉकेट-साइन्स' के गूढ विज्ञान जैसा जटिल भी नहीं है, लेकिन नीतीश जी के मुँह से ऐसी बात सुन कर हँसी आना, हतप्रभहोना तो लाजिमी ही है l

तरस आता है नीतीश जी की हताशा पर, उनके विरोधाभासी चरित्र को उजागर करने वाले उनके ही बयानों पर l मैं नीतीश जी से ये पूछना चाहूँगा कि संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का ख्याल उन्होंने कभी रखा क्या? संवैधानिक संस्थाओं व परम्पराओं को मज़ाक बनाकर अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल नीतीश जी ने किसी से कम किया है क्या?

नीतीश जी लोगों की यादाश्त को कमजोर समझने की भूल कर रहे हैं क्या? कोई कैसे भुला सकता है कि कैसे संवैधानिक परंपरा की अवहेलना करते हुए नीतीश जी ने बिना भाजपा मंत्रियों के इस्तीफे का इंतजार कर अपने 'फेवरेबल' गवर्नर से उन्हें बर्खाश्त करवा दिया थाl आज उनके ही नुस्खे का इस्तेमाल जब माँझी कर रहे हैं तो नीतीश जी को संवैधानिक संस्था की नीयत में खोट नजर आने लगा? 

नीतीश जी ने राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों को तोड़कर कैसे सदन में उनकी संबद्धता को संवैधानिक  जामा पहनाया था ये नीतीश जी को अच्छी तरह से याद होगा ही! सारी संवैधानिक परम्पराओं व व्यवस्थाओं को ताके पर रख कर बिहार के वर्तमान विधान सभा अध्यक्ष का अपने फायदे के लिए नीतीश जी ने जितनी बार पूरी ढिठाई से इस्तेमाल किया है उसे थोड़ी भी राजनीतिक व संवैधानिक सोच व जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति भूला तो नहीं ही हैl क्या नीतीश जी की संवैधानिक विवेचना में विधानसभा अध्यक्ष का पद संवैधानिक संस्था नहीं है? 

संविधान में ये प्रावधान है, साफ दिशा-निर्देश है कि विधानसभा व विधानपरिषद का अध्यक्ष तटस्थ रह कर सदन में संविधान के अनुरूप संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करे और ये सुनिश्चित करे की विधायिका में संवैधानिक व्यवस्थाओं-प्रक्रियाओं का उल्लंघन ना हो l 

लेकिन नीतीश जी ने बिहार की सत्ता संभालने से लेकर आज तक के नौ-साढ़े नौ साल की अवधि में विधान सभा व विधान परिषद अध्यक्ष को अपने 'एजेंडों' की पूर्ति करने वाले 'एजेन्टों' की तरह ही इस्तेमाल किया l अपनी ही पार्टी के विक्षुब्द्ध विधायकों की सदस्यता विधान सभा अध्यक्ष की मिली-भगत से नीतीश जी ने जिस तरह से खत्म करवाई थी वो क्या संविधान के अनुरूप था? अगर'हाँ' तो फिर कैसे माननीय उच्च-न्यायालय ने इन विधायकों की सदस्यता बहाल कर दी? कोई आश्चर्य नहीं कि नीतीश जी कभी ये भी कहते हुए नजर आ जाएँ कि माननीय उच्च-न्यायालय भी 'किसी' के इशारे पर काम कर रहा था या उसे संविधान की जानकारी नहींथी! नीतीश जी ने राष्ट्रीय जनता दल से तोड़कर लाए गए लोगों को जिस प्रकार से विधानपरिषद में मनोनीत करवाया था वो क्या संविधान की मूलधारणा के अनुरूप था? 

अब बात माँझी को बिहार के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाने की ... ये तो स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा भी जानता है कि विधायक दल के निर्वाचित नेता को ही राज्यपाल मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाते हैं, विधायक दल के नेता का निर्वाचन एक संवैधानिक व्यवस्था है, क्या नीतीश जी ये बताने का कष्ट करेंगे कि माँझी जी को विधायक दल का नेता चुना गया था या खुद नीतीश कुमार को? 

वैसे इस संदर्भ में खुद नीतीश जी और उनका खेमा हाल के दिनों में खुले आम कहता देखा-सुना जा रहा है कि विधायक दल का नेता तो नीतीश जी को ही चुना गया था लेकिन नीतीश जी ने माँझी जी को मनोनीत कर मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाई l अब यहाँ नीतीश जी से सीधा सवाल है कि उनको (नीतीशजी को) मुख्यमंत्री के मनोयन का अधिकार संविधान की किस व्यवस्था-परंपरा-संस्था-प्रक्रिया के तहत प्राप्त था और राज्य की शीर्ष संवैधानिक कुर्सी (राज्यपाल) को उन्होंने इसके लिए कैसे 'मैनेज' या 'तैयार' किया था? 

अब बात माँझी विद्रोह के बाद नीतीश जी के विधायक-दल का नेता चुने जाने की ..... संवैधानिक व्यवस्था के तहत मुख्यमंत्री विधायक दल का नेता होता है, नीतीश जी और उनके समर्थकों को छोडकर पूरी दुनिया यही मानती है l विधायक दल के नए नेता का चुनाव तभी होता है जब मुख्यमंत्री का त्यागपत्र राज्यपाल के द्वारा मंजूर कर लिया जाता है और राज्यपाल की ओर से 'नए दावों' पर विचार करने की प्रक्रिया प्रारंभ होती हैl ये संवैधानिक व्यवस्था है और ये नीतीश जी को भी अवश्य ही ज्ञात होगा, भले ही अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने की हड़बड़ी में वो इससे अंजान बन रहे हों ! 

इससे जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू ये है कि सरकार के अल्पमत में होने की पुष्टि सदन में विश्वास-मत पर निर्णय होने से होती है और विश्वास-मत की पूरी प्रक्रिया संविधान-सम्मत हो इसकी जिम्मेवारी विधानसभा अध्यक्ष पर होती है और अगर इस संदर्भ में राज्यपाल के द्वारा कोई विशेष दिशा-निर्देश है तो उसे मानने के लिए संवैधानिक व्यवस्था के तहत विधान सभा अध्यक्ष बाध्य होता है l अगर सरकार विश्वास-मत हासिल करने में विफल रहती है तो इसकी सूचना विधान सभा अध्यक्ष की ओर से राज्यपाल को दी जाती है और फिर नए दावों को ध्यान में रख कर राज्यपाल नई सरकार के गठन की प्रक्रिया आरंभ करते हैं और फिर दावा करने वाला गुट अपने नए नेता का चुनाव करता है और विधान सभा अध्यक्ष के पास स्वीकृति के लिए भेजता हैl 

विधायक दल के नेता के चुनाव में सारी विधायीपरम्पराओं का पालन किया गया है या नहीं इस देखते हुए विधान सभा अध्यक्ष चुने गए नेता को मान्यता प्रदान कर अपनी अनुशंसा राज भवन को भेजते हैं और फिर नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति को राज्यपाल संवैधानिक अमलीजामा पहनाते हैं l अपने आप को गद्दी पर बिठाने की हड़बड़ी के हालिया प्रकरण में क्या नीतीश जी ने इस पूरी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया और अगर नहीं तो क्या नीतीश जी इस मुगालते में हैं कि वो संवैधानिक व्यवस्थाप्रक्रिया से ऊपर हैं? 

अब बात राज्य की शीर्ष संवैधानिकसत्ता (व्यवस्था) पर नीतीश जी के पक्षपात के आरोपों की .... नीतीश जी ने अपने बयानों में सार्वजनिक व सीधे तौर पर राज्यपाल की नीयत पर सवाल उठाया है और उन्हें (नीतीश जी को) माँझी की सरकार को २० तारीख तक का समय दिए जाने और सदन के निर्णय के बाद ही कोई फैसला लिए जाने के राज्यपाल के निर्णय पर भी एतराज है, ऐसा कर वो किसी व्यक्तिविशेष को अपमानित नहीं कर रहे, किसी राजनीतिक व्यवस्था पर दोष-निर्धारण नहीं कर रहे अपितु संवैधानिक-व्यवस्था की अवमानना कर रहे हैं l 

संवैधानिक व्यवस्था-परंपरा का ये कैसा पालन? कैसा सम्मान? राज्यपाल कोई व्यक्ति नहीं होता जो 'भीड़' की 'भावना' को देख-सुनकर निर्णय ले ले, किसी के व्यक्तिगत विचारों से प्रभावित हो कर निर्णय लेने के लिए संविधान ने राज्यपाल में कुछ भी निहित नहीं किया है l राज्यपाल संविधान-सम्मत प्रक्रिया का पालन करने केलिए बाध्य है और उसे उस निर्णय पर पहुँचने के लिए कितना वक्त चाहिए और उसे किन प्रक्रियाओं का पालन करवाना है ये उसका विशेषाधिकार है और अगर कोई भी मामला न्यायालय के विचाराधीन हो और न्यायालय ने उसकी व्याख्या कर उस पर कोई टिप्पणी कर किसी भी निर्णय पर पहुँचने के लिए आगे की कोई तारीख तय की हो राज्यपाल के द्वारा न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करना नीतीश जी की नजर में संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन है क्या? 

इन संवैधानिक पेचीदीगियों को जानते-समझते हुए भी राज्यपाल पर दोषारोपण कर नीतीश जी खुद को मज़ाक का विषय नहीं बना रहे हैं क्या? अगर राज्यपाल नीतीश जी के सत्ता हासिल करने के उतावलेपन में उनके कहे अनुसार नहीं चल रहे तो राज्यपाल की मंशा पर सवाल? कैसी मर्यादा है ये? अगर राज्यपाल आपकी सहूलियत और आपके कहे अनुसार चलते तो शायद ना ही संवैधानिक परम्पराओं का मज़ाक बनता ना ही संवैधानिक-संस्था पक्षपाती नजर आती? संविधान की व्याख्या नीतीश जी के अनुरूप होती तो सब ठीक रहता क्यूँकि नीतीश जी की 'इच्छाएँ', उनकी 'महत्वाकांक्षाएं' ही संविधान-सम्मत हैं बाकी सब 'मज़ाक'? 

नीतीश जी को सिद्धान्त, मर्यादा, संविधान-संवैधानिक संस्थाओं-मर्यादाओं का पालन व सम्मान करने की बड़ी-बड़ी बातें (खोखली) करने के लिए भी जाना जाता है लेकिन नीतीश जी खुद अपनी या अपनी छत्र-छाया में इन सबों की धज्जियां उड़ाते-उड़वाते हुए अक्सर नजर आते हैं l 

अब चंद दिनों पहले राष्ट्रपति भवन में नीतीश जी के द्वारा आयोजित विधायकों की परेड के दौरान हुए वाकये को ही लें ... महामहिम राष्ट्रपति जी से मिलने के बाद राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में जिस तरह से नीतीश जी की उपस्थिति में उनके समर्थक विधायकों ने नारेबाजी की वो क्या देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था की मर्यादा के अनुकूल था? 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' शायद नीतीश जी जैसे लोगों ध्यान में रख कर ही लिखा गया होगा l 

अंत में बात नीतीश जी के द्वारा लगाए जा रहे आरोप "राज्यपाल समय दे कर 'हॉर्स-ट्रेडिंग' के लिए माकूल माहौल बना रहे हैं" l नीतीश जी का ये आरोप सीधे तौर पर ये इंगित करता है कि बिहार के वर्तमान राज्यपाल भी ऐसी किसीट्रेडिंग' का हिस्सा हैं! 

वैसे तो 'हार्स-ट्रेंडिंग' भारत की राजनीति के लिए कोई नई बात नहीं है लेकिन अभी तक देश में कोई भी राज्यपाल इसमें शामिल हुआ है ये बात कहीं से खुल कर नहीं आई है l हाँ एक बात जरूर सत्यापित है कि आज जिस 'हॉर्स-ट्रेडिंग' का रोना नीतीश जी रो रहे हैं उसमें अपनी महारथ उन्होंने अनेक मौकों पर साबित की है l 

सारे प्रकरणों की अगर यहाँ चर्चा की जाए तो आलेख अनावश्यक रूप से लंबा और उबाऊ हो जाएगा l यहाँ सिर्फ दो-तीन प्रकरणों का जिक्र ही ये साबित कर देगा कि कैसे नीतीश जी का इस 'हॉर्स-ट्रेंडिंग' के खेल में भी कोई सानी नहीं है l

लोक जनशक्ति पार्टी को तोड़ने के लिए कौन सी 'ट्रेडिंग' हुई थी? सम्राट चौधरी व अन्य को तोड़ कर लाने और मंत्री बनाए जाने के पीछे किस 'ट्रेडिंग' का सहारा लिया गया था? और हालिया प्रकरण में जिस प्रकार से विधायकों को पटना से दिल्ली ले जाकर होटल के कमरों में कैदियों की माफिक रखा गया वो क्या 'हॉर्स-ट्रेडिंग' में ही अपनाए जाने वाला पुराना हथकंडा नहीं था? क्या ले जाए गए विधायकों को 'हॉर्स-ट्रेडिंग' के बाजार में दिया जाने वाला 'लौलीपॉप' नहीं दिया गया होगा? अगर नहीं तो यहाँ ये समझने की भी जरूरत है कि सिर्फ प्रलोभन और लेन-देन ही 'हॉर्स-ट्रेडिंग' के दायरे में नहीं आते हैं अपितु ज़ोर-जबर्दस्ती से विधायकों को अपने कब्जे में रखना भी इसी ट्रेडिंग का हथकंडा है और क्या ऐसा करके नीतीश जी ये साबित करते हुए नहीं दिखते कि 'हॉर्स-ट्रेडिंग' संविधान की मर्यादाओं का उल्लंघन है और ऐसा करने से उन्हें कोई परहेज भी नहीं है? 

जिस राजनीतिक-शुचिता की दुहाई, भले ही दिखाऊ, देते हुए नीतीश जी अक्सर नजर आते हैं उसका न्यायोचित व तार्किक तकाजा यही है कि "दूसरों पर दोषारोपण करने के पहले खुद को ही उस पर तौला जाए और ये साबित किया जाए कि मैं ऐसे दोषों से पूर्णतः मुक्त हूँ" l नहीं तो 'चलनी दूसे सूप को' वाली लोकोक्ति ही चरितार्थ होती है l


आलोक कुमार (वरिष्ठ पत्रकार वविश्लेषक), पटना

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