आमरने अनशन के परोगराम, सब कष्टे दूर हो जईतई...

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आज दोपहर बिहार के 'सरकारी उपवासकार्यक्रम-स्थल पर जाने काथोड़ी देर केर लिए ही सही, 'पुण्यमैंने भी किया. उपवास-स्थल के बाहर तो मेले सा दृश्य थासरकारी अमला भी पूरी तरह चौकस थाएम्बुलेंसें भी दिखीं और मुस्तैद डॉक्टरों का जत्था भी. सब के सब बिल्कुल 'अलर्ट' , हों भी क्यूँ ना रोज 'जम कर खाने वालेआज 'उपवासपर जो थे.

'पुण्य-पवित्र' स्थल से थोड़ी दूरी पर 'जुटाए गए भक्तों' की भीड़ भी थी और ठेले-खोमचे वालों ने भी अपनी दुकान सजा रखी थी. सबों की बिक्री-ग्राहकी भी 'मस्त' चल रही थी. मेरी दिलचस्पी भी ज्यादा इसी 'खेमे' में थी क्यूँकि यहाँ जो देखने-सुनने को मिलता है वही सच भी होता है और कलम को उसकी असल-खुराक भी यहीं से मिलती है.

जेपी के अंदाज में सिर पर गमछा बाँधे एक बुजुर्ग से जब मैंने ये पूछा कि "बाबा क्या आप भी आज अनशन पर हैं?" तो थोड़ी देर मुझे घूरनेके बाद उन्होंने बड़ा ही रोचक जबाव दिया, "न बाबु..... हमरा त चीनी के बीमारी है, डाक्टर भूखे रहेला मना किहिस है; हम त अईसेहीं सभे (सब) के साथे चल आए हैं, गाँवो में बईठल का करते?"

मैंने फिर उनसे पूछा "ई अनशन का होता है, आप जानते हैं?"

बुजुर्ग के चेहरे पर तुरंत तल्खी के भाव उभर आए और उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा "आप हमरा धुरे समझे हैं का? मर्दे हम ऊ जमाना के बीए (BA) हैं ... अनशन का होता है ई हमरा बढ़िया से मालूम है आऊर अगर आपको नहीं मालूम है त बता देते हैं . एकरा (अनशन को) गाँधी जी ने सत्याग्रह के रूप में अपनाया था आऊर एकरा बाद एकर फैशन बढ़ाया बाबा अन्ना हजारे आउर उनखर (उनके) चेलन (चेलों ने) सब. ई नीतीशजी त 'सत्याग्रह सिनेमा' बनावे वाला के चक्कर में पड़ कर ई में फंस गए हैं".

इतना ही मेरे ये समझने के लिए काफी था कि बुजुर्ग राजनीति और आज के दौर के चोंचलों की नब्ज पहचानना बखूबी जानते हैं.

अब मैं मुखातिब था राजधानी के समीप केग्रामीण इलाके बेलदारीचक से आकर सत्तू का ठेला लगाए हुए रामकिशुन से मैंने पूछा: "का हो कईसन बिक्री-बट्टा है?"

रामकिशुन के चेहरे की मुस्कान ही बता रही थी सब 'चका-चक' है. रामकिशुन ने सत्तू का गिलास मेरी तरफ बढाते हुए कहा: "सब बढ़िया हबअ भईया, रोजे अईसन बिक्री रहे त हमर जईसन गरीब आऊर ओकर परिवार के 'रोज के अनशने' खत्म हो जाए. तोहनी सब समझाहूँ न नीतीश जी के कुछ रोज आऊर अनशन पर बैठिथिन याआमरने (आमरण) अनशन के परोगराम (प्रोग्राम) चले...हमनी के त सब कष्टे दूर हो जईतई."

रामकिशुन की गँवई बोली में कही गई 'गंभीर-बात' मेरी समझ में आ चुकी थी और मैं रामकिशुन के 'रोज के अनशन' और 'सरकारी अनशन' के फर्क को समझने की कोशिश में आगे चल पड़ा.

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