बिहार की बिसात: सुशील मोदी का प्रोजेक्शन भाजपा की रणनीतिक भूल होगी

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दो दिनों पहले पटना में एक समारोह में भाजपा नेता श्री सुशील कुमार मोदी के संसदीय जीवन के २५ साल पूरे होने पर एक अभिनंदन समारोह का आयोजन खुद सुशील मोदी के द्वारा ही आयोजित किया गया चंद दिनों पहले एक ऐसा ही आयोजन नीतीशजी के ३० साल के संसदीय जीवन के उपलक्ष्य में नीतीश जी के चहेते शैवाल गुप्ता की कथित समाजसेवी संस्था आद्री के परिसर में आयोजित किया गया था l

 वैसे भी दोनों में काफी समानताएँ हैं और दोनों में छनती भी खूब हैलेकिन राजनीतिक मजबूरीवश विरोध का दिखावा करना पड़ता हैपिछले १० वर्षों में बिहार को जैसे छला गया उसमें इन दोनों में से कौन बड़ा अपराधी है ये तय करना भी बहुत मुश्किल है जब तक भाजपा-जद (यू) गठबंधन था तब तक दोनों 'रंगा-बिल्लाकी भूमिका में ही थे लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी कायम हुईं कि दोनों को बिछड़ना पड़ा l

दोनों अपनी autocratic स्टाइल के लिए भीजाने जाते हैं और अपने-अपने रास्ते के रोड़ों को किनारे लगाने की दोनों की शैली भी एक समान है दोनों को अपनी ही पार्टी में विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है लेकिन दोनों के पक्ष में एक ही कॉमन-फैक्टर है "दोनों की ही पार्टी में विरोध करने वाला कोई सशक्त चेहरा नहीं है l "

अब बात मुद्दे की.... सुशील मोदी जी के आयोजन में चंद केंद्रीय मंत्रियों ने भी शिरकत की और सुशील मोदी केंद्रीय मंत्री श्री वेंकैया नायडू से ये संकेत दिलवाने में भी कामयाब रहे कि बिहार विधानसभा में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा भी वही रहेंगे और चुनावों की अगुवाई भी वही करेंगे सोशल -मीडिया और प्रिंट-मीडिया में सुशील मोदी जी ने इस को खूब उछाला भीउनके समर्थकों में तो ऐसा उत्साह देखने को मिल रहा है मानो भाजपा हाई-कमान ने अपना फैसला ही सुना दिया होअगर ऐसा होता है तो तय मानिए की ऐन चुनावों के वक्त भाजपा में अगर कोई बड़ी टूट हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं l

सुशील मोदी से भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता और पार्टी के पुराने वरिष्ठ लोग कभी खुश नहीं रहे हैं और ये लोग अगर पार्टी छोडकर नहीं भी जाते हैं तो भी भीतरघात से तो बाज नहीं ही आएंगे सुशील मोदी से हिसाब चुकता करने वालों की प्रतीक्षा-सूची काफी लंबी है और ऐसे लोग बस सही समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं l

चुनावों में भाजपा को समर्थन देने वाला सवर्ण समुदाय भी सुशील मोदी से खफा है और ये तबका सुशील मोदी को किसी भी कीमत पर स्वीकारेगा इसमें मुझे तो संदेह है मेरी राय में "अगर भाजपा सुशील मोदी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करती है या इनकी अगुवाई में चुनावों में जाती है तो ये भाजपा का tactical-error होगा और इसका फायदा निश्चित रूप से लालू यादव को होगा l

यहाँ ये बताना जरूरी है कि लोकसभा चुनावों के पहले से लालू यादव भाजपाई विक्षुब्धों को बिना शोर-शराबे के बड़ी चतुराई से फीलर्स दे रहे हैं और सवर्णों को भी लुभाने की लालू जी की कोशिशें जारी हैं अपनी इस मुहिम में लालू यादव कुछ हद तक सफल भी हुए हैं बिहार का सवर्ण मतदाता नीतीश जी से भी खफा है और अगर भाजपा की रणनीतिक भूल के कारण वो भाजपा से दूर होता है तो उसके पास लालू यादव के सिवाय कोई दूसरा मजबूत विकल्प नहीं बचता है जिसकी मदद से वो इन दोनों (नीतीश एवं सुशील) को सबक सीखा सके l

आज की तारीख में सर्वर्णों केबीच में लालू यादव के लिए उतना विक्षोभ नहीं है जितनी वितृष्णा नीतीश एवं सुशील मोदी के लिए है बिहार का चुनावी इतिहास बताता है कि सवर्ण मतदाता संख्या में कम होने के बावजूद निर्णायक चुनावी रणनीति तय करते आया है और अकेले दम पर सरकार बनाने का माद्दा तो नहीं रखता लेकिन सरकार गिराने और अपने विरोधियों के मंसूबों पर पानी डालने का काम बखूबी करता आया है l 'कुछ भी हो जाए सवर्ण मतदाता तो मजबूरीवश भाजपा के साथ ही आएगाअगर भाजपा ये मान कर चल रही है तो ये भाजपा का भ्रम है और इसका खामियाजा भाजपा को अवश्य भुगतना होगा l

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