मीडिया के दाग केजरीवाल और उनके कुनबे से कम काले हैं !

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कल जब दिल्ली के ‘मुख्य-संतरी’ और आम आदमी नौटंकी पार्टी’ के संचालक श्री अरविंद केजरीवाल को जनता का रिपोर्टर’ कार्यक्रम (प्री-रिकोर्डेड) में टीवी पर बोलते सुना तो मुझे पक्का विश्वास हो गया कि अब कलयुग खत्म हो चुका है और भट्ठ-युग’ अपने परवान पर है l

मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो कर सार्वजनिक-मंच से मवालियों वाली भाषा में मीडिया को केजरीवाल जब लताड़ रहे थे ऐसा लगा रहा था जैसे कोई सड़क-छाप लफ़्फुआअपनी भड़ास निकाल रहा हो !! भट्ठ-युगके बारे में सुधी-जन ठीक ही कहते हैं कि इस युग में जनने वाले (जन्म देने वाले) को भी गालियाँ ही सुनने को मिलेंगी और यही केजरीवाल ने किया; जिस मीडिया ने केजरीवाल और उनके कुनबे को जना उसे ही केजरीवाल ने जम कर कोसा और लताड़ा l”

केजरीवाल ने जब ये कहा कि आज मीडिया ने उनकी पार्टी को खत्म करने की सुपारी ले रखी है और वो मीडिया को उसकी औकात बता देंगे तो इससे आम आदमी पार्टी और उसकी रोड-छाप संस्कृति का चित्रण सहजता से एक बार फिर हो गया l”

केजरीवाल ने मीडिया के पब्लिक-ट्रायल की बातें की जो साफ तौर पर केजरीवाल कीतालिबानी मानसिकताको दर्शाता है l अगर मीडिया भी केजरीवाल के पब्लिक-ट्रायल की बातें करने लगे तो क्या केजरीवाल को मंजूर होगा ? आज जब मीडिया की स्क्रूटनी में केजरीवाल और उनकी पार्टी है, नित्य उनकी, उनकी पार्टी और उनके तथाकथित सदाचारी नेताओं की कलई खुल रही है और उनकी हाँ में हाँ मिलाने से मीडिया किनारा कर रही है तो मीडिया केजरीवाल को बैरी नजर आने लगी?? पूर्व में यही केजरीवाल इसी मीडिया के तलवे चाटा करते थेl

ऐसा नहीं है कि कोई राजनीतिक दल या राजनीतिक शख्सियत पहली बार मीडिया की स्क्रूटनी में हैगुजरात के मुख्यमंत्रित्व काल से लेकर आज तक नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के रडार पर रहें हैं लेकिन मोदी ने भी कभी ऐसी छिछली और अमर्यादित प्रतिक्रिया नहीं दीl राहुल गाँधी के बारे में मीडिया ने क्या कुछ नहीं कहा-सुना लेकिन कभी भी राहुल गाँधी ने मीडिया को केजरीवाल सरीखी भाषा में कोसा नहीं l

केजरीवाल को शायद इसका आभास नहीं है कि जनता ये बखूबी जानती-समझती है कि अमर्यादित व अभद्र भाषा का प्रयोग एक कमजोर एवं झुँझलाया हुआ व्यक्ति ही करता है l” मुझे ये कहने में कोई हिचक नहीं है कि आज मीडिया का दामन भी दागदार है (ऐसा मैं एक अर्से से कहता आया हूँ), लेकिन इसके बावजूद मीडिया के दाग केजरीवाल और उनके कुनबे से कम ही काले हैं l”

आज सड़सठ सीटों का अहंकार केजरीवाल व उनके भोंपूओं के सिर चढ़ कर बोल रहा है लेकिन शायद केजरीवाल और उनके भोंपू ये भूल रहे हैं कि जिस मीडिया ने उन्हें व उनके कुनबे को जना और फिर हीरोबना दिया उसी मीडिया को उन्हें और उनके बदमिजाज कुनबे को जीरोबनाते भी देर नहीं लगेगी, लाख विसंगतियों के बावजूद इतनी ताकत तो मीडिया में अब भी बची है l

केजरीवाल के ऐसे आचरण व आख्यान से ये फिर से साबित होता दिखता है कि आम आदमी पार्टी एक दिशाहीन कुनबा है जिस के पास जनता से मिले अपार समर्थन का जोश तो है, उससे उपजा हुआ अहंकार तो है मगर विरोध का सामना करने हेतू कोई मर्यादित राजनीतिक सोच एवं रणनीति नहीं है शायद इस सच से केजरीवाल और उनके नजदीक के लोग भली-भाँति वाकिफ हैं और इसी को ध्यान में रखकर ऐसे वक्तव्यों की आड़ में सरकार के रूप में अपनी जिम्मेवारी से लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश में लिप्त हैं l जनता से ऐसा समर्थन मिलेगा इसकी उम्मीद शायद केजरीवाल एंड टीम को भी नहीं थी और आज जब मीडिया केजरीवाल को जन-आकांक्षाओं के तराजू पर तौल रही है तो उन्हें और उनके कुनबे को मीडिया का ये रवैया नागवार गुजर रहा है l

केजरीवाल व उनके कुनबे को ये नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति का इतिहास बताता है कि "मीडिया अर्श से फर्श तक भी पहुँचाती है और चुनावों में जीत के खुमार का भी ईलाज बखूबी करती है l" चुनाव जीतना और शासन करना दो भिन्न मुद्दे हैं, केजरीवाल एंड टीम में अनुभवहीन व अनुशासनहीन लोगों की भीड़ ही ज्यादा है l देश और प्रदेश चलाने का दायरा बहुत ही व्यापक है l

यहाँ ये नहीं भुलाया जासकता कि ये उन लोगों का ही जमावड़ा है जिन्होनें अन्ना के जन-आन्दोलन को बिखेर कर रख दिया था, अन्ना के आंदोलन को हाइजैक कर मीडिया को ये कहने को मजबूर किया था किना खुदा मिला ना बिसाले सनम l” ये द्रष्टव्य है कि केवल चुनावों में बेहतर प्रदर्शन से व्यवस्था परिवर्तन का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है। आज के दौर का तकाजा है कि मीडिया के माध्यम से जनता के साथ संवाद स्थापित कर जनहित की नीतियों को अमली-जामा पहनना होगा नहीं तो "आप की छापका निशान मिट जाएगा l वैसे भी भारत में "टिकाऊ झाड़ू" नहीं मिलता l

क्या केजरीवाल के पास इतनी भी समझ नहीं है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ के बारे में ऐसी बयानबाजी से अप्रिय स्थिति पैदा हो सकती है? क्या केजरीवाल को इसका तनिक भी भान नहीं है कि मीडिया कर्मियों का भी अपना एक बौद्धिक और सामाजिक स्तर होता है और सार्वजनिक पद पर रहने वाला कोई भी व्यक्ति मीडिया को न तो बाहर कर सकता है और न ही उसकी अनदेखी कर सकता है?? ऐसा नहीं है किदिल्ली की सत्ता की रजिस्ट्री सदैव के लिए केजरीवाल और उनकी पार्टी के नाम हो गई है , पाँच साल बाद फिर चुनाव होंगे और यकीन मानिए उस समय यही केजरीवाल फिर से इसी मीडिया के तलवे चाटते नजर आएंगे

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