सुतल साँप के ढेला नय मारे के चाही

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जहर पीने की बात तो लालू जी ने की थी लेकिन अब नीतीश जी उनको ही विषधर बता रहे हैंl ऐसे में इस 'जहरीले गठबंधन' का हश्र क्या होने वाला है सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है l

नीतीश जी खुद को चन्दन बता रहे हैं कोई आश्चर्य की बात नहीं, वैसे भी आत्म-मुग्धता की पराकाष्ठा नीतीश जी ने कब की पार कर ली है l जिस दिन से गठबंधन बना है नीतीश कुमार ने लालू यादव को नीचा दिखाने को कोई भी अवसर गंवाया नहीं है, आए दिन नीतीश जी लालू यादव पर तंज़ कसते ही रहते हैं l

गठबंधन की घोषणा के बाद नीतीश जी के तीखे कटाक्षों का सीधा जवाब लालू यादव ने तो कभी नहीं दिया l हाँ ... रंघुवंश प्रसाद सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं के माध्यम से सीधा और तीखा प्रहार जरूर करवायाl वैसे भी लालू यादव सीधी बात करने के लिए ही जाने जाते हैं, लेकिन शायद आज परिस्थितियाँ उनके अनुकूल नहीं हैं इसलिए लालू खुद रक्षात्मक रुख अपनाए हुए हों ! लेकिन लालू  अचानक से आक्रामक रवैया अपना कर जय-क्षय की लड़ाई लड़ने को तैयार हो जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं ! और इसके लिए नीतीश कुमार को तैयार रहना होगा l

लालू यादव में एक खासियत तो है जो बिहार के किसी और राजनेता में नहीं है वो है 'बाउन्स-बैक' करने का माद्दा l पूर्व में भी अनेकों मौकों पर लालू यादव ने इसे साबित भी किया है l अनेकों बार लालू यादव को 'राइट-ऑफ' किया गया, लेकिन अनेकों विरोधाभासों के बावजूद लालू उभर कर आए l लोकसभा चुनावों के पूर्व की ही बात की जाए तो सजायाफ्ता होने और जेल जाने के बाद सभी लोगों ने ये कह दिया था कि "NOW LALU IS FINISHED" l मोदी लहर का वेग था और नीतीश जी सत्ता में थे, बिहार में लड़ाई मोदी vs. नीतीश की मानी जा रही थी लेकिन परिणाम क्या हुआ? सत्ता के सहारे और १०० से ऊपर विधायकों के साथ के बावजूद नीतीश जी किसी तरह से २ का आँकड़ा ही हासिल कर पाए और मात्र २४ विधायकों के साथ, नकारात्मक छवि के बड़े बोझे के बावजूद लालू यादव ने ६ सीटें पायीं l

मुझे अभी भी अच्छी तरह से याद है लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान हम लोगों (मीडियाकर्मियों) ने जब भी लालू यादव से ये पूछा कि “जैसा की सतही तौर से देखने पर पता चलता है और जैसा कहा-सुना जा रहा है बिहार में लड़ाई नीतीश जी और मोदी जी (नमो) के बीच में ही है?” लालू यादव का जवाब होता था "कोई चाहे जो कह ले लड़ाई मेरे और भाजपा के बीच ही होगी l"

खराब सेहत के बावजूद, सीमित संसाधनों, अपने पास शो-केसकरने के लिए कुछ ना होने के बावजूद एवं लोगों के द्वारा पहले से हारा हुआ करार दिए जाने के बाद भी ऐसा आत्म-विश्वास लालू यादव को लड़ाकू और जुझारू नेता तो जरूर साबित करता है l लालू यादव के इसी 'ट्रैक-रिकॉर्ड' को देखते हुए नीतीश जी को भी जरा संयमित व सचेत रहने की जरूरत है l फिर भी अगर नीतीश जी की नजरों में लालू साँप ही हैं तो हमारे बिहार में एक कहावत काफी प्रचलित है - "सुतल साँप के ढेला नय मारे के चाही (सोए हुए साँप को पत्थर नहीं मारना चाहिए)" और नीतीश जी को इतना तो जरूर पता होगा कि लोकोक्तियाँ और कहावतों के भावार्थ प्रामाणिक होते हैं ....!!


Alok Kumar, Sr. Journalist, Patna.

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