आज के समाज़वाद में 'लोहिया' के नाम की सिर्फ दुहाई है

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चंद दिनों पहले २३ मार्च को हरेक साल की भांति एक बार फिर लोहिया जयन्ती की रस्म-अदायगी पूरे देश में भाषणों और माल्यर्पणों के दौर के साथ संपन्न हुई । आज डॉ. लोहिया की प्रासंगिकता सिर्फ आयोजनों व् व्याख्यानों तक ही सीमित है । डॉ. लोहिया के सिद्धांतों को अमलीजामा पहनाने का साहस व् संकल्प न तो उनके 'कथित अनुयायियों' में है न ही बारम्बार उनका जिक्र करने वालों में

आज जिस तरहसे धर्म को विखंडन का शस्त्र बना वोट-बैंक की राजनीति के चूल्हे को गर्म करने का चलन चरम पर है, लोहिया के समाजवाद में तो ये कतई नहीं थाडॉ. लोहिया ने तो कहा था "धर्म जब स्तुति तक सीमित हो जाता है, मानवीय संबंधों में अच्छाई नहीं स्थापित करता तो निष्प्राण हो जाता है और राजनीति जब बुराई से लड़ती नहीं तो कलही हो जाती है"

आज की राजनीति डॉ. लोहिया के इस वक्तव्य को अक्षरशः चरितार्थ कर रही है वह कहा करते थे कि "हिंदुस्तान के सामाजिक परिवेश में हिंदू और मुसलमान के बीच उभरी दरार को सियासत करने वाले खाई बनाने में लगे हैं , यह दुखद है.... इस खाई के सहारे राजनीति की रोटी तो सेंकी जा सकती है, पर इंसानियत के जख्म नहीं भरे जा सकते " इसी संदर्भ में डॉ. लोहिया आगे कहा करते थे "मेरा बस चले तो हर हिंदू को समझाऊं कि रजिया, रसखान और जायसी मुसलमान नहीं, बल्कि हमारे-आपके पुरखे थे.... ठीक इसी तरह मुसलमानों को भी समझाऊं कि गजनी, गोरी और बाबर उनके पुरखे नहीं, बल्कि हमलावर थे "

डॉ. लोहिया ने तो साठ के दशक में ही देश की भावी समस्याओं को बखूबी समझ लिया था, इसीलिए वह कहा करते थे "गरीबी हटाओ, हिमालय बचाओ, नदियां साफ करो, पिछड़ों को विशेष अवसर दो, बेटियों की शिक्षा व विकास का समुचित प्रबंध हो, गरीबों के इलाज का इंतजाम हो, किसानों को उपज का लाभकारी मूल्य मिले, खेती और उद्योग में समन्वय बनाकर विकास का एजेंडा तय हो, गरीबी के पाताल और अमीरी के आकाश का फासला कम करने के जतन हों।" अफसोस... न तो आज लोहिया हैं न ही उनके विचारों पर अमल करने वाला कोई 'समाजवादी' आज की समाजवादी राजनीति तो सुरक्षा, सायरनों औरसैफई में जुटी सुंदरियों के घेरे में 'बटोरने की प्रतिस्पर्धा' तक ही सीमित है

आज समाज़वाद का जो विकृत रूप हमारे सामने है, उसमें लोहिया के नाम की सिर्फ दुहाई है और उनके समाज़वाद के दर्शन को सत्ता-सुख से जोड़ दिया गया है, समाज गौण है स्वहित-वाद प्रभावी है लोहिया कभी बेजा दर्शन के हिमायती नहीं थे,  क्यूँ की उन्हें पता था खालिस दर्शन से समाज का कुछ भला होने वाला नहीं है वोट बैंक की राजनीति के लिए लोहिया की चिन्तन-धारा का बेजा इस्तेमाल समाजवाद का वैसा विकृत स्वरूप  है जो अपने हिसाब से गढ़ा गया है ऐसा समाज़वाद राजनीति और समाज को सिर्फ पतन की ओर ही लेकर जाने वाला है ! लोहिया एक नयी सभ्यता और संस्कृति, एक नयी  राजनीति के द्रष्टा और निर्माता थे। लेकिन कालांतर में लोहिया के विचारों को सिर्फ ऊपरी व सतही ढंग से ग्रहण करने की कोशिशें हुईं जो सूत्र लोहिया के समाजवादी विचार की विशेषता है, वही सूत्र उनकी विचार-पद्धति भी है न की आज का स्वहित के लिए संशोधित समाज़वाद जिसे हम देख- सुन और झेल रहे हैं ।

समाज को गहराई से समझने और परखने का दूसरा नाम ही लोहिया का समाज़वाद है लोहिया ने समाज को अपने विचारों के मानक पर खूब जाँचने परखने के बाद ही समाज़वाद की परिभाषा और परिधि को समाज के लिए गढ़ा था लोहिया के समाज़वाद में कोरे वादों के लिए कोई जगह नहीं थीन ही आज के समाजवादी कुनबे के समाज़वाद की तरह आडम्बरपूर्ण लोहिया जी ने जो कहा जो किया खुद को सत्ता से दूर रखते हुए समाज के हित के लिए किया था डॉ. लोहिया इतिहास की गति के साथ वर्तमान को जोड़कर चलने के हिमायती थे ! उन्हें पता चल गया था की मार्क्सवाद और गांधीवाद दोनों का महत्त्व मात्र-युगीन था लोहिया की दृष्टि में मार्क्स पश्चिम के तथा गांधी पूर्व के प्रतीक हैं और लोहिया पश्चिम-पूर्व की खाई पाटना चाहते थे। मानवता के दृष्टिकोण से वे पूर्व-पश्चिम, काले-गोरे, अमीर-ग़रीब, छोटे-बड़े राष्ट्र, स्त्री-पुरुष के बीच की दूरी मिटाना चाहते थे

लोहिया की विचार-पद्धति सही मानों में समग्र थी । वे पूर्णता व समग्रता के लिए प्रयास करते थे। लोहिया का कहना था "जैसे ही मनुष्य अपने प्रति सचेत होता है, चाहे जिस स्तर पर यह चेतना आए और पूर्ण से अपने अलगाव के प्रति संताप व दुख की भावना जागे, साथ ही अपने अस्तित्व के प्रति संतोष का अनुभव हो, तब यह विचार-प्रक्रिया होती है कि वह पूर्ण के साथ अपने को कैसे मिलाए, उसी समय उद्देश्य की खोज शुरू होती है।"

जनमानस के राजनीतिक अधिकारों के पक्षधर रहे डॉ. लोहिया ऐसी समाजवादी व्यवस्था चाहते थे जिसमें सभी की बराबर की हिस्सेदारी रहे वह कहते थे "सार्वजनिक धन समेत किसी भी प्रकार की संपत्ति प्रत्येक नागरिक के लिए होनी चाहिए " डॉ. लोहिया रिक्शे की सवारी नहीं करते थे अपितु कहते थे कि "एक आदमी एक आदमी को खींचे यह अमानवीय है  और वही जब हम आज के समाजवाद का अवलोकन करते है तो पाते हैं कि आज समाजवाद का प्रचार रिक्शे से किया जाता है

लोहिया ने जहाँ आम-खास की मानसिकता से समाज को मुक्त कराने की बातें और कोशिशें कीं वहीं  वर्तमान समाजवाद के पुरोधाओं ने तो आम-खास का एक नया मानक ही गढ़ दिया समाज के भीतर जहाँ डॉ. लोहिया ने सम्पूर्ण समाज को एक परिवार के रूप में मानने की बात कही थी, वहीं  आज के समाजवादी किसी  परिवार विशेष में ही पूरा समाजवाद देख रहे है

आज भारत की हरेक राजनैतिक विचारधारा डॉ. लोहिया के समाजवाद की बातें तो करती है, 'समरस समाज' की दुहाई तो देती है लेकिन व्यावहारिक तौर पर आज हरेक की राजनीति के सिर्फ तीन ही सिद्धांत हैं :

१.सत्ता को साधने के लिए सबको साधो

२. राजा के सुख में ही प्रजा का सुख, और

३.राजा के हित में ही प्रजा का हित

'आज के राजा (हमारे नेता)' 'अपने और अपनों' के लिए देश के लोगों से उनका तन, मन, धन और यहाँ तक की जीवन भी मांग रहे हैं ये बातें तो करते हैं आम आदमी की लेकिन सफलता मिलते ही आम आदमी और जनहित पीछे छूट जाते हैं और अपना हित ही सर्वोपरि बन जाता है यह सब नीयत का ही खेल है, आज नीयत में ही खोट है, तभी तो डॉ. लोहिया कहते थे "नेता की नीतियां नहीं, उसकी नीयत देखो "

इसी खोटी नीयत ने आज राजनीति को विशुद्ध व्यवसायबना दिया है ऐसे में राजनीति के माध्यम से पद, पैसा, प्रतिष्ठा हासिल करना सबसे सहज व सुरक्षित दिखता है और यही आकर्षण राह भटकी हुई राजनीति के मूल में है हमारे गरीब देश के राजनेता देशी-विदेशी बैंकों में अथाह धन जमा करते - करवाते हैं, अपनी अवैध कमाई को अप्रत्यक्ष निवेश का जरिया बनाते हैं, यह सब नीयत का ही तो खेल है !! यदि नीयत ठीक हो जाए तो भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, बेईमानी, मिलावटखोरी, जमाखोरी और महंगाई जैसी अनेक समस्याओं का एकमुश्त समाधान निकल आए और डॉ . लोहिया की सार्थकता भी सिद्ध हो जाए !!


Alok Kumar, Sr. Journalist, Patna.

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