दिनकर को भी जातिगत समीकरणों में 'समेट' लिया गया

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आज हिन्दी साहित्य के ओज-पुरुष राष्ट्र कविरामधारी सिंह 'दिनकर' जी की पुण्य-तिथि है.... हिन्दी साहित्य की बात तो क्या भारत में साहित्य (किसी भी भाषा) की कोई भी चर्चा दिनकर जी की चर्चा के बिना अधूरी है. अजीब विडम्बना है दिनकर जी की कृतियों पर दशकों पहले से विदेशों में शोध हो रहे हैं, अनेकों विदेशी विश्वविद्यालयों व शोध-संस्थानों में 'दिनकर-चैपटर्स' हैं लेकिन अपने ही देश और अपनी ही मिट्टी बिहार में दिनकर जी की याद लोगों को सिर्फ जयंती व पुण्य-तिथि पर आती है l

दिनकर जी जैसे कालजयी सृजनकार को भी जिसने दशकों पहले ये लिखा था, :

"तेजस्वी सम्मान खोते नहीं गोत्र बतला के,

पाते हैं जग से प्रशस्ति अपना करतब दिखला के l

जाति-जाति रटते, जिनकी पूंजी केवल पाखंड,

मैं क्या जानूँ जाति? जाति हैं ये मेरे भुजदंड l"…

मृत्त्योपरांत आज जातिगत समीकरणों में 'समेट' लिया गया है l

अपनी ही भूमि बिहार में राजनीतिज्ञों और कुत्सित मानसिकता वाले भूमिहार जाति के स्वयम्भू ठेकेदारों ने दिनकर जी की प्रासंगिकता केवल माल्यार्पण एवं जातिगत वोट की राजनीति तक ही तक सीमित कर दी l चुनावों के दौर में दिनकर जी का पैतृक गाँव सिमरिया खद्दरधारियों का तीर्थ बन जाता है लेकिन दिनकर का साहित्य कैसे पीढ़ी दर पीढ़ी तक पहुँचे इसकी परवाह करने वाला कोई नहीं है l

दुःख तो तब होता है जब बिहार की ही युवा पीढ़ी दिनकर जी के बारे में पूछे जाने पर सवालिया नजरों से देखती है l दिनकर जी की रचनाओं का 'तेज' अगर 'हम' भावीपीढ़ी तक पहुँचा पाए तो आनेवाली पीढ़ियों का 'तेज' भी बढ़ेगा और एक 'मनस्वी' बिहार व भारत का निर्माण होगा l

यहाँ एक बात का जिक्र भी करना चाहूँगा जो मेरे द्वारा ऊपर कही गई बातों को स्वतः स्पष्ट व प्रमाणित करने में सहायक होंगीl नीतीश जी की पहल पर एवं उनकी  अगुवाई में राजधानी पटना में वर्षों से लिटरेचर-फेस्टिवल का आयोजन हो रहा है लेकिन हतप्रभ करने वाली बात ये है कि अब तक किसी भी फ़ेस्टिवल में दिनकर जी का जिक्र तक नहीं हुआ है ना ही किसी स्मारिका या पोस्टर में दिनकर जी की तस्वीर प्रकाशित की गई l देश व प्रदेश में कोई भी साहित्यिक आयोजन हो और उसमें दिनकर जी की चर्चा ना हो तो क्या ऐसे आयोजनों के औचित्य पर सवालिया निशान खड़े नहीं होंगे? हरेक वर्ष होने वाले बिहार दिवस के किसी भी मंच पर न तो दिनकर की चर्चा होती है न ही दिनकर की कोई तस्वीर ही नजर आती है l दिनकर जी का व्यक्तित्व वकृतित्व किसी सम्मान या जिक्र का मोहताज नहीं है अपितु दिनकर जी का जिक्र मात्र देशव बिहार के लिए सम्मान की बात है l

ये क्या हमारी (ऐसे लोगों की) घटिया सोच को नहीं दर्शाता है जो जातिगत मानसिकता से ऊपर कभी उठ ही नहीं सके और दिनकर जी जैसे मनीषी को भी दायरों में सीमित कर दिया? विडंबना तो ये है क़ि दिनकर के सगों को भी दिनकर की ऊंचाईयों का भान नहीं है, रॉयल्टी के मिलने वाले चेक पर अंकित 'शून्य' का ज्ञान व् ध्यान अवश्य है l "सिहांसन खाली करो की जनता आती है" का 'हुंकार' भरने वाले को आज 'जनता' भी भूल चुकी है और 'सिंहासन' ने तो 'मजबूरियों' के तहत पहले ही भूला दिया था l

कोटिशः नमन सरस्वती-पुत्र को...


Alok Kumar, Sr. Journalist, Patna.

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