"अपने लोगों" ने ही नीतीश जी को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया है

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बिहार की सरकार काफी समय से नक्सलवाद को महज कानून और व्यवस्था की समस्या कह कर इसकी भयावहता का सही अंदाजा लगाने में नाकामयाब रही है l बिहार में भी इनकी (नक्सली) सत्ता के आगे राज्य सरकार बेबस है, औरंगाबाद का हालिया नक्सली हमला इसका ताजा- तरीन उदाहरण है l

बिहार के लगभग ३८ जिलों में से ३४ जिलों में नक्सलियों का दबदबा है l ऐसे में यक्ष-प्रश्न यह है कि "जब बिहार के अधिकांश जिले नक्सल प्रभावित हैं, इसके बाद भी इस समस्या का हल निकालने के लिए कोई ठोस नीति आज तक क्यों नहीं बनाई गई है? नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन ग्रीन-हंट जैसा ही कोई प्रभावी अभियान बिहार में क्यूँ नहीं चलाया जाता है?”

निःसंदेह इसका लाभ यहाँ के नक्सली उठाते हैं l अगर ख़ुफ़िया-सूत्रों कि मानें तो पिछले कुछ वर्षों में बिहार में नक्सलियों का हमला कई गुना अधिक बढ़ा, नक्सली हमलों में इजाफा हुआ है और नक्सली अब बड़े हमलों को अंजाम दे रहे हैं.... लेवी वसूली से जुड़े नक्सली हमले खबरों की सुर्खियां नहीं बन पाती हैं इस कारण लोगों का ध्यान इस ओर ज्यादा नहीं जाता है l”

२०१५-१६ में बिहार में लगभग ६० से अधिक जवान और नागरिक इन हमलो में मारे गए, बिहार पुलिस के एक आला अधिकारी की मानें तो "ये सरकारी-आंकड़े हैं वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है l" वहीं हथियारों की लूट भी बड़े पैमाने पर हुई l यहाँ गौर करने वाली बात है कि २०१३ में पूरे देश में नक्सलियों ने जितने हथियार सुरक्षा- बलों से छिने थे, उसका ५० फीसदी अकेले बिहार से छीना गया था (२०१३ के बाद के आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, २०१३-२०१६ तक के आधिकारिक आंकड़ें उपलब्ध कराने में सरकारी महकमे भी अपने हाथ उठा ले रहे हैं) l

बिहार में हाल के दिनों में जिस तरह से नक्सली घटनाओं में इजाफा हुआ है और जिस तरह की पुलिसिया कार्रवाई नक्सलियों को काउंटर करने के लिए की जा रही है उसे देख कर बेहिचक ये कहा जा सकता है कि बिहार पुलिस के हौसले पूरी तरह पस्त हैं l २०१५-१६ में एक भी नक्सली को अपने दम पर मारने में बिहार पुलिस सफल नहीं हुई है l इसके बावजूद भी बिहार सरकार के गृह-विभाग कि "कुम्भकर्णी-निद्रा" नहीं टूटी है l बिहार में नक्सल प्रभावित जिलों में नक्सलियों के सफाये के लिए कोई अग्रेसिव (आक्रामक) अभियान नहीं चलाया जा रहा है l आखिर क्या है प्रदेश सरकार कि नक्सल-नीति? वो मारते रहें और हमारे जवान और नागरिक भेड़-बकरी की तरह मरते रहें? बिहार पुलिस की गोलियों से क्यों नहीं मरता एक भी नक्सली हमलावर? ऐसे में सरकार राज्य के नागरिकों की सुरक्षा और नक्सल-उन्मूलन के प्रति कितनी चिंतित है यह समझा जा सकता है !!

सरकार को चाहिए कि वो नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में गंभीरता से सोचे, सिर्फ बैठकें कर लेने और मीडिया के सामने बयानबाजी कर देने से इस समस्या का समाधान नहीं होने वाला है । ठोस कार्रवाई वक्त की मांग है। प्रदेश के राजनेता और आला-अधिकारी किसी बड़े नक्सली हमले के बाद शहीदों के शवों पर श्रद्धाञ्जलि के नाम पर फूलों का बोझ ही तो बढ़ाने जाते हैंऔर नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए लम्बी-चौड़ी मगर खोखली बातें करते हैं । लेकिन जब नक्सलवाद के खिलाफ ठोस रणनीति या कार्रवाई करने का समय आता है तो हमारे नेता "गांधीवादी राग" अलापने लगते हैं।

बिहार में सियासी बिसात पर नक्सलवाद को जब-तब सहलाया गया, पुचकारा गया है । ये समस्या भी वोट की सियासत में उलझ कर रह गई । २०१३ में बिहार के तत्कालीन व् वर्त्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी का एक बयान आया था कि "बिहार में नक्सलवाद कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है।" नक्सलियों को उन्होंने ‘‘अपने लोगों’’ की संज्ञा दी थी । अब एक बार फिर इन्हीं ‘‘अपने लोगों’’ ने नीतीश जी को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया है ।

औरंगाबाद की हालिया घटना और बिहार के अन्य इलाकों में हो रहे नक्सली हमले सरकार और समाज के लिए चेतावनी हैं l इसमें अब कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि "नक्सली अब केवल क्षेत्रविशेषमें फैले निरंकुश एवं असंतुष्ट 'अपने' नहीं रह गए हैं, अपितु वे एक ऐसा अनुत्तरित सवाल हो गए हैं, जिसका जवाब ढूँढना न केवल जरूरी है, बल्कि हमारी मजबूरी भी।" अब वक्त आ गया है कि बातों की भाषा न समझने वाले नक्सलियों को उन्हीं की भाषा में सबक सिखाया जाए ।


Alok Kumar, Sr. Journalist, Patna.

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