गुजरात में दलित-उत्पीड़न के आंकड़े चौंकाने वाले

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देश में दलित उत्पीड़न एक गंभीर मुद्दा है, खास तौर से उस स्थिति में जब सरकार ने आम जन से भय, भूख एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने का वायदा किया है। सिर्फ दलित उत्पीड़न की घटनाओं को देखा जाए तो पिछले दो वर्षो में दलितों की पिटाई, दलितों का समाजिक बहिष्कार, दलित महिलाओं के साथ बलात्कार, उनकी बेदखली आदि जैसी कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो बहुत ही शर्मनाक हैं।

ऐसी घटनाओं का सिलसिला थमता नहीं दिखता है और देश के भिन्न हिस्सों में दलितो पर अत्याचार होने की जानकारियां नित्य मिलती हैं । ऐसी घटनाओं की जानकारी भी हमें तभी होती है जब उत्पीड़ित दलित किसी तरह प्रशासन तक पहुँच पाते हैं या उनके बारे मे किसी स्रोत से देर-सवेर जानकारी मिलती है। घटनाएं जब हमारे सामने होती हैं तब वह कई दिन पुरानी भी हो चुकी होती है और ज्यादातर घटनाएं तो सतह पर आ ही नहीं पाती हैं l

इन घटनाओं के पीछे जो कारण उभरकर सामने आते हैं, वे यह दर्शाते हैं कि समाज में अभी भी सामंती मानसिकता कायम है और अधिसंख्य दलित समुदाय बहिष्कृत जीवन जीने को ही विवश है। दलितों को शेष समाज के साथ भेद-भाव रहित जीवन जीने के लिए किए जा रहे सरकारी एवं गैर सरकारी प्रयासों के बावजूद उनके सामाजिक बहिष्कार के नए-नए रूप देखने को मिल रहे हैं, ये चिंता का विषय है । कई मामलों में तो ये सामने आया है कि दलितों पर सीधे प्रहार की जगह उन पर कई तरह के झूठे आरोप लगा दिए जाते हैं, मसलन ... दलित युवा ने सवर्ण महिलाओं से छेड़छाड़ की है या करने का प्रयास कर रहा था, वह शराबी था जिससे गांव या इलाके का माहौल खराब हो रहा था, दलितों द्वारा सवर्णों का विरोध किया जा रहा था इत्यादि और फिर उसके बाद उन पर दमन-उत्पीड़न की कार्रवाई की जाती है। ऐसे आरोपों का निराधार होना अचरज की बात नहीं, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े दलितों की सामाजिक हैसियत अभी भी निम्न है और प्रशासन, पैसा और सत्ता के गंठजोड़ में सवर्णों की तुलना मे वे कहीं नहीं टिकते हैं ।

देश में घट रही दलित-उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयास नाकाफी दिखते हैं। एक ओर दलित सामाजिक एवं आर्थिक रूपसे तिरस्कृत हैं और दूसरी ओर उन पर हुए अत्याचारों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। स्थानीय पुलिस प्रशासन से उन्हें मदद नहीं मिल पाती, उल्टे उन्हें वहां से प्रताड़नाएं ही मिलती हैं, दोहन होता है । हाल के दिनों में अनेकों ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिनमें दलितों एवं कमजोर तबके के लोगों को झूठे केसों में फंसाने का कुचक्र रच गया है l

तथाकथित गतिशील व् विकसित गुजरात में दलित-उत्पीड़न के आंकड़े तो चौंकाने वाले हैं... गुजरात में हर साल एक हजार दलित अत्याचार का शिकार हो रहे हैं, साल में औसतन २० दलितों की हत्या हो रही है और ४५ दलित महिलाओं से दुष्कर्म की घटनाएं हो रही हैं l पिछले दस सालों में २०२ दलितों की हत्या की गई है, जबकि ५७२ दलितों पर हमले हुए हैं, ४५३ दलित महिलाओं से दुष्कर्म किया गया है, जबकि ७४ लोगों को आग से नुकसान पहुंचाया गया है l ९५०४ दलितों ने आईपीसी की भिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज कराएं हैं, जबकि पीसीआर एक्ट के तहत ३४ मामले दर्ज हुए हैं l दस सालों में कुल १० हजार ८३९ मामले दर्ज हुए हैं, जो दर्शाता है कि हर साल औसतन १०८३ दलितों पर गुजरात में अत्याचार होता है l राज्य में तीन सालों से ऊपर के १२५७ मामले निलंबित है, जबकि जिन्हें दर्ज हुए १० साल से भी ज्यादा हो चुके हैं ऐसे ५२२ मामले हैं, एक साल से ऊपर के ११४० मामले लंबित हैं l (ये तथ्य सूचना के अधिकारके तहत हासिल किए गए हैं) l

दलितों को न्याय दिलाने व एट्रोसिटी एक्ट के क्रियान्वन में भी गुजरात काफी पीछे है l आईए उपलब्ध आंकड़ों पर एक नजर डालें... गुजरात में अप्रैल २०१५ से सिंतबर २०१५ के दौरान सिर्फ ३०६ मामलों का निपटारा किया गया है, जिनमें से महज १२ मामले ही साबित हुए l जिनमें सजा हुई वैसे मामलों में सजा का प्रतिशत महज ३.९२ है l वर्ष २०११ में दर्ज मामलों में सजा का प्रतिशत २.१० था, जो वर्ष २०१२ में ७.८० प्रतिशत था l

केंद्र और राज्य की सरकारें यह दावा तो करती हैं कि देश व् प्रदेश को भयमुक्त बनाना है पर सरकारों द्वारा ली गई इस जिम्मेदारी का परिणाम दिख नही रहा है और दलितो का उत्पीड़न बदस्तूर जारी है l दलित उत्पीड़न की घटनाओं को देख कर ये बेहिचक कहा जा सकता है कि सरकारें (राज्यों व् केंद्र की) इन मामलों में उदासीन रवैया ही अपना रही हैं । एससी-एसटी (प्रिवेंसन ऑफ एट्रोसिटी) संशोधन एक्ट-२०१५ के क्रियान्वन की कोई नीति-नियम व परिपत्र भी अभी तक किसी भी सरकार ने उचित रूप से तैयार नही की है l

स्वतन्त्रता प्राप्ति के साढ़े छ: दशकों से ऊपर के काल-खण्ड में भी सशक्त कार्यपालिका व् निष्पक्ष न्यायपालिका के तमाम दावों के बावजूद भी अगर दलित-उत्पीड़न का सिलसिला अनवरत जारी है तो व्यवस्था पर सवाल उठेंगे ही l


Alok Kumar, Sr. Journalist, Patna.

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