ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि मध्यप्रदेश की पुलिस को एंकाउंटर करना पड़ा?

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चर्चा एनकाउंटर पर नहीं सुरक्षा में हुई बड़ी चूक पर होनी चाहिए थी हल्ला मारे गए कथित आतंकियों के कपड़ों पर नहीं शिवराज सरकार के भ्रष्ट जेल अधिकारियों पर होना चाहिए था बिना जेल-प्रशासन की मिलीभगत के आठ लोगों का त्रिस्तरीय सुरक्षा-घेरे को तोड़कर आठ किलोमीटर दूर तक पैदल पहुँच जाना संभव है क्या ? सवाल उठाना ही है तो शिवराज सरकार के गृह-मंत्री के पल-पल बदलते विरोधाभासी बयानों पर उठाईए

आतंकवादियों की हिमायती तो शिवराज सरकार साबित हो रही है जिसके नुमाइंदों ने कथित आतंकवादियों को जेल से भागने का अवसर दिया जेल से भागने की ज़िम्मेदारी गर तय की जाए तो उस से कैसे पल्ला झाड सकती है शिवराज की भगवा व स्वयंभु मंगल राज वाली सरकार?

ऐसी बड़ी चूक का ज़िम्मेवार कौन है? ये कैसे सुनिश्चित होगा कि देशहित से जुड़े सुरक्षा के गंभीर मामले में ऐसी कोताही-लापरवाही आगे नहीं होगी?

अगर आतंकवादियों की जगह दोज़ख में है तो भागने में मदद करने वालों की जगह भी दोज़ख में ही है तो क्यूँ नहीं जिस किसी ने भी भगाया उसे चिन्हित कर उसका भी एंकाउंटर कर दिया जाए? आतंकवाद को मदद पहुंचाने वाला तो आतंकवादी से भी ज्यादा खतरनाक है आतंकवादी तो चिन्हित है लेकिन जो पर्दे के पीछे से उसकी मदद करे रहे हैं वो तो बिना सामने आए देश के साथ भीतरघात कर रहे है

पार्टी विथ डिफ़्रेन्स के समर्थक भोपाल जेल-ब्रेक कांड के संदर्भ में शिवराज सरकार के जेल-विभाग की लापरवाही और भागने-भगाने के खेल में जेल-प्रशासन की मिलीभगत पर पर्दा डालने के लिए पुराना रटा-रटाया जुमला दुहरा रहे हैं "जाँच जारी है" इस देश में जाँच से अब तक कुछ निकल कर सामने आया है क्या? जाँच का हश्र क्या होता है ये भी अब किसी से छुपा है क्या? राज्य सरकार द्वारा गठित जाँच आयोग या कमिटी सरकार के नाकामी पर पर्दा डालने के सिवा कुछ और करेगी ये सोचना भी बेमानी है ! अगर निष्पक्ष जाँच की मंशा है तो केंद्र या राज्य की सरकार माननीय सर्वोच्च से ये एक जाँच आयोग गठित करने की अनुशंसा करे

समर्थक के साथ-साथ राज्य की सरकार ये भी कह रही है कि जाँच में अगर कोई जेल से भगाने में मदद पहुंचाने का दोषी पाया जाएगा तो उस पर न्यायिक-प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाएगी

ऐसे में मेरा सीधा सवाल है कि भागे हुए कथित आतंकवादियों पर भी तो न्यायिक-प्रक्रिया के तहत कार्रवाई जारी थी फिर ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि प्रदेश की पुलिस को उनका एंकाउंटर करना पड़ा? क्या आठ लोगों को स्टेट एटीएस जैसी फोर्स जो ऐसी ही परिस्थितियों के लिए विशेष तौर पर प्रशिक्षित होती है निहत्था कर (अगर सच में उनके पास हथियार थे तो) गिरफ्तार करने में असमर्थ थी? या पोल खुलने या जेल-प्रशासन के बड़े अधिकारियों के बेनकाब होने के डर ने एटीएस और सूबे की पुलिस को एंकाउंटर करने के लिए मजबूर किया? क्या कथित आतंकियों के पास इतने हथियार थे कि सशस्त्र बल की एक बहुत बड़ी संयुक्त टुकड़ी के लिए भी खतरा थे? अगर हाँ तो उनके हथियारों का जखीरा कहाँ गया या उस जखीरे का जिक्र कोई अब तक क्यूँ नहीं कर रहा? इससे ही जुड़ा अहम सवाल ये है कि जेल में कड़ी सुरक्षा वाले आतंकी-सेल में कैद इन भगोड़ों के पास हथियार आए या पहुंचाए गए कैसे?


Alok Kumar, Sr. Journalist, Patna

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