किसी 'बटखरे' के बोझ तले दब कर भ्रामक खबरें दिखाना मीडिया का काम नहीं है

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तृणमूल नेत्री व बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी के बाद राजद ही एक मात्र ऐसा राजनीतिक दल है जो केन्द्र सरकार के नोटबन्दी के अव्यावहारिक फैसले के खिलाफ अपने नेता श्री लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में सड़क पर उतरा है l

राजनीति में विरोध का स्वर तभी प्रखर व प्रभावी होता है जब आप जनता के बीच जाते हैं, जनता के साथ सड़क पर उतरते हैं l टीवी कैमरों के सामने और अखबार के पन्नों पर दिए गए बयानों से विरोध तो दर्ज होता है लेकिन राजनीतिक लड़ाई का दायरा सड़क पर उतरने के बाद ही व्यापक होता है और आम जन का साथ भी तभी ही मिलता है

राजनीति के बदलते हुए परिवेश को ध्यान में रख कर ही बात की जाए तो जनता से सीधे संवाद व जुड़ाव के सबसे असरदार माध्यमों में से है आम जनता व अपने समर्थकों  को साथ लेकर धरना-प्रदर्शनों का आयोजन l १९९० के दशक के शुरुआती दिनों से ही देखें तो इस फ्रंट पर लालू यादव अपने विरोधियों के साथ-साथ अपने सहयोगियों से भी बीस ही दिखते हैं l तटस्थ हो कर लालू यादव के सम्पूर्ण राजनीतिक कैरियर को अगर सरसरी निगाह से ही देखा जाए तो ये साफ़ दिखाई देता है कि लालू यादव जनता की नब्ज टटोलने में माहिर हैं और किसी भी मुद्दे को जनता की जद्दोजहद से जोड़ कर लड़ाई को अंजाम तक पहुँचाने में जो महारथ श्री यादव को हासिल है वो हिन्दी-हार्टलैंड के किसी और नेता में तो नहीं ही है l सड़क पर उतर कर अपनी ही शैली में अपनी बात अपने समर्थकों व अवाम तक कैसे पहुँचाई जाती है ये श्री यादव बखूबी जानते हैं और यही कारण है कि अनेकों दफा राजनीतिक पंडितों और पूर्वाग्रह से ग्रसित मीडिया के एक बड़े तबके के द्वारा ये कहे-लिखे जाने के बावजूद कि "लालू इज फ़िनिश्ड नाऊ" लालू यादव ने जोरदार वापसी कर आकलनों को गलत साबित किया है l

लालू यादव की राजनीति के केंद्र में गरीब-गुरबों, शोषित-पिछड़ों, किसान-मजदूरों से जुड़े मुद्दे ही प्रमुखता से रहे हैं और लालू यादव ने अपनी राजनीतिक लड़ाइयों में इसका जम कर प्रयोग भी किया है और फायदा भी उठाया है l लालू यादव से बेहतर शायद कोई और राजनेता ये जानता-समझता ही  नहीं कि जनता जब परेशानियों से हल्कान हो रही होती है तभी वो किसी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा बनती है l जनता आँकड़ों की बाजीगरी में ज्यादा नहीं फँसती, ऐसे में अगर कोई अहम राजनीतिक चेहरा रोजमर्रा की ज़िंदगी में आने वाली व्यावहारिक परेशानियों की बात कर रहा होता है तो जनता उसके साथ हो लेती है और इसे ही ध्यान में रख कर लालू यादव ने नोटबंदी के निर्णय के फलस्वरूप आम जनता को हो रही दुश्वारियों को अपने ही कलेवर में आवाज़ दे कर केंद्र सरकार के खिलाफ एक लंबी लड़ाई की घोषणा कल पटना में अपने नेतृत्व में महाधरने के आयोजन के साथ की है l अंजाम क्या होगा वो तो वक्त ही बताएगा लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अपने इस निर्णय के साथ 'बाकियों' पर लालू यहाँ एडवांटेज लेते दिख रहे हैं l

नोटबंदी के मुद्दे की ही बात की जाए तो ...वैसे तो शुरुआत से ही अपने बयानों और टीवी बाईट्स के माध्यम से राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद और राजद के युवा चेहरे बिहार के उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव नोटबन्दी के खिलाफ मुखर रहे हैं, लेकिन राजद सुप्रीमो के समर्थकों व उनके वोट बैंक, जिसमें विशेषकर हाशिये पर खड़ा अवाम ही है, को लालू यादव के द्वारा एक ऐसी आक्रामक लड़ाई की आस थी जो सड़क से चलकर सदन में खत्म हो और लालू यादव ने अपने समर्थकों, अपने वोटर्स, अपने चाहने वालों को निराश नहीं किया l अपनी बीमारी की अटकलों को विराम देते हुए कल (दिनांक २८.१२.२०१६) पटना के गर्दनीबाग इलाके में राजद द्वारा आहूत महाधरने में अपने चिर-परिचित अंदाज में लालू यादव ने मोदी नीत सरकार की जम कर क्लास लगाई और नोटबंदी के खिलाफ एक बड़ी रैली की घोषणा की l

मैं कल प्रात: से ही राजद के इस आयोजन को कवर करने हेतू आयोजन स्थल पर मौजूद था और धरना में शामिल होने आए राजद समर्थकों-कार्यकर्ताओं एवं दर्शक बन कर आए आम लोगों के मूड को भाँपने की मेरी कोशिश भी जारी थी l राजद कार्यकर्ताओं का उत्साह तो लाजिमी ही था क्यूंकी उनके नेता लालू प्रसाद यादव एक अर्से के बाद बीच सड़क पर एक नए एजेंडे के साथ उनसे रूबरू थे l नोटबंदी से परेशान दर्शक के रूप में वहाँ पहुँची आम जनता भी लालू प्रसाद को सुनने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी, शायद जनता को ये भान था कि आज लालू राजनीति की बात ना कर उनकी दुश्वारियों की ही बात करेंगे और हुआ भी यही l लालू ने किसी को निराश नहीं किया सिर्फ और सिर्फ नोटबंदी से जुड़ी मशक्कतों-दुश्वारियों की ही बातें कीं l

शहरी जनता को लालू यादव के आगमन की प्रतीक्षा करते देखना वहाँ मौजूद प्रायोजित मीडिया को शायद हजम नहीं हुआ तभी तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के एक तबके ने लालू यादव की अगुवाई में आयोजित धरने को बिना धरने का कोई बाईट दिखाए 'फ्लॉप' करार दे दिया l धरने में शामिल लोगों की संख्या ५५० के करीब बता कर एबीपी न्यूज ने तो हद ही कर दी l सोचने वाली बात है कि लालू यादव किसी आयोजन में शामिल हों और सिर्फ 550 लोगों आएं?  ये कैसी रिपोर्टिंग? कैसी पत्रकारिता? ये मेरी समझ से परे है ...!! पत्रकारिता को जहाँ तक सीधी-सपाट भाषा में मैंने समझा और जिसका पालन किया है वो ये है कि "जो देखा, जो सुना उसे ही अपने विवेक का इस्तेमाल कर बिना किसी तोड़-मरोड़ कर दिखाया, सुनाया और लिखा l"

हकीकत तो यही है कि बेशक लालू यादव के कल के 'धरने' में उनकी रैलियों के मुकाबले जुटी भीड़ (16-18 हजार के करीब की संख्या) काफी कम थी लेकिन वो शायद इसलिए कि राजद ने पूरे बिहार में प्रखण्ड-ब्लॉक और जिला स्तर पर भी कल ही नोटबंदी के खिलाफ धरना आयोजित किया था l गौरतलब है कि धरने और रैली में बड़ा अंतर होता है l

मैं एक अर्से से लालू यादव को कवर करते आ रहा हूँ और अपने अनुभव के आधार पर मेरा कहना है कि जैसी संख्या एबीपी न्यूज वाले बता रहे हैं उससे ज्यादा लोग तो रोज लालू-राबड़ी आवास के गेट पर जुटे रहते हैं l एबीपी न्यूज ने जो कल फुटेज दिखाया वो 10 सर्कूलर रोड, लालू-राबड़ी आवास का था, धरना-स्थल का फुटेज एबीपी न्यूज ने दिखाया ही नहीं l

आज के दौर की मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल यूँही नहीं उठते हैं l ऐसे में कैसे आम जनता ये मानेगी कि जो वो देख-सुन-पढ़ रही है वही सच है? माना कि एबीपी न्यूज को देखकर एक बड़ी आबादी के बीच एक आम धारणा बनी होगी कि कल का लालू जी का शो फ्लाप हो गया लेकिन वैसे लोग जो वहाँ मौजूद होंगे और जिन लोगों को इन लोगों ने लालू के धरने के बारे में बताया होगा उनका तो विश्वास इस कथित चैनल पर से उठ ही गया होगा !! मुँह से मुँह, कान से कान फैलती हैं बातें और गर एक बार विश्वास उठ जाता है तो शायद ही फिर पूरी तरह से कायम हो पाता है l किसी इवेंट को कवर कर रही मीडिया का काम किसी 'बटखरे' के बोझ तले दब  कर, 'डंडीमार- तराजू' पर तौल कर भ्रामक खबरें दिखाना नहीं है l ये काम विरोधियों, आलोचकों और विश्लेषकों पर ही छोड़ दिया जाए ये ही मीडिया के हरेक माध्यम के लिए बेहतर है l


Alok Kumar,
Senior Journalist & Analyst

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