एकतरफा पहलू दिखाने-छापने के पीछे मीडिया की मंशा क्या है?

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कल बिहार की राजधानी पटना में राष्ट्रीय जनता दल व् भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं / समर्थकों के बीच बीच सड़क पर हिंसक झड़प हुई। दोनों दलों के चंद कार्यकर्ता / समर्थक इस झड़प में जख्मी भी हुए । झड़प की शुरुआत किस ओर से हुई और किस ने किस को पहले उकसाया ये जाने बिना मीडिया इस झड़प को राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकर्ताओं के द्वारा भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय पर हमले के रूप में प्रचारित / प्रकाशित व् प्रोजेक्ट कर रहा है

क्या मीडिया किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित है ? प्रथमद्रष्टया प्रतीत तो यही होता है क्यूँकि बिना पर्याप्त व् समुचित जानकारी के किसी एक पक्ष पर दोष / आरोप मढ़ देना मीडिया की भूमिका को सवाल-संदेह के घेरे में ही लाता है । राजनीतिक दलों के समर्थकों / कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प निःसंदेह निंदनीय है और ऐसी झड़पें लोकतंत्र के लिए कुछ अच्छे संकेत देती हुई भी नहीं दिखती हैं लेकिन ऐसी झड़पों के सन्दर्भ में मीडिया का तटस्थ नहीं रहना भी चिंतनीय है।

किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले मीडिया को तथ्यों व् तहकीकात के साथ मामले की तह तक जाना चाहिए था सीधा आरोप तय कर देने के पूर्व मीडिया ने ये जानने की कोशिश भी की क्या कि राष्ट्रीय जनता दल का कोई भी कार्यकर्ता / समर्थक भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय परिसर में प्रवेश कर गया था ? क्या राजद कार्यकर्ताओं ने भाजपा प्रदेश कार्यालय की किसी भी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया या वहाँ किसी भी प्रकार की तोड़-फोड़ की ? क्या भाजपा के प्रदेश कार्यालय के भीतर घुस कर भाजपा कार्यालय को क्षति पहुँचा रहे, तोड़-फोड़ में लिप्त राजद कार्यकर्ताओं / समर्थकों की कोई तस्वीर-फुटेज मीडिया के पास है ??

जवाब मैं बता देता हूँ। 'नहीं' तो ऐसे में सड़क पर हुई ये बहुप्रचारित झड़प भाजपा कार्यालय पर हमला कैसे ?

घटना की जानकारी मिलने के तुरंत बाद मैंने घटनास्थल पर मौजूद अपने चंद पत्रकार मित्रों से जब बात कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली तो मुझे मेरे पत्रकार मित्रों ने ये बताया कि राजद कार्यकर्ताओं के द्वारा नारेबाजी हो रही थी और साथ में कुछ अभद्र नारों का इस्तेमाल भी लेकिन राजद कार्यकर्ता हिंसक नहीं थे ।  पत्थरबाजी की शुरुआत भाजपा कार्यालय के अंदर से हुई, बीयर की बोतलें फेंकीं गयीं तत्पश्चात राजद कार्यकर्ता भी उग्र हो गए और पूरा इलाका रण-क्षेत्र में तब्दील हो गया।

पत्रकार मित्रों के द्वारा दी गयी जानकारी मुझे तार्किक व् व्यावहारिक भी लगी क्यूँकि अगर देखा जाए तो जिस इलाके में जिस वीआईपी सड़क पर ये हिंसक झड़प हुई वहाँ पत्थरों का ढेर तो रखा होता नहीं जिसका इस्तेमाल राजद कार्यकर्ताओं ने कर लिया ? मीडिया के द्वारा समाचार पत्रों व् वेब पोर्टल्स पर जारी / प्रकाशित तस्वीरों को ही साक्ष्य मान कर अगर बात करें तो प्रदर्शन कर रहे किसी भी राजद कार्यकर्ता के हाथ में प्रदर्शन की शुरुआत से लेकर भाजपा कार्यालय के सामने वाली सड़क तक पहुँचने तक ईंट, पत्थर, बीयर या किसी भी तरह की कोई और बोतल तो नहीं ही दिखती है । राजद कार्यकर्ताओं / समर्थकों के हाथों में पार्टी के झंडे लगे डंडे जरूर थे।

ऐसे में सवाल में उठता है कि क्या भाजपा समर्थकों ने पहले से अपने प्रदेश कार्यालय परिसर में ईंट-पत्थर और बीयर की बोतलें जुटा रखीं थीं ? क्या राजद कार्यकर्ताओं को उकसाने व् हमले की तैयारी पूर्व-नियोजित थी ?

विडिओ-फुटेज की ही बात करें तो माथे पर भगवा पट्टी बाँधे भाजपा कार्यकर्ताओं के हाथों में भाला नजर आता है, उत्तर-बिहार से आने वाले भाजपा के एक विधान-पार्षद तो हाथों में तलवार लिए दिखाई देते हैं । हैरानी होती है कि ये सब मीडिया को कैसे और क्यूँ नहीं दिखा ? मामलों की तह तक जाने एवं सब कुछ दिखने का दावा करने वाली मीडिया को ये सब कैसे नहीं दिखा ? क्या मीडिया भी आग में घी डालने की भूमिका अदा कर रही है ? एकतरफा पहलू दिखाने-छापने के पीछे मीडिया की मंशा क्या है ? क्या मीडिया अपनी 'विवशताओं-लाचारियों' के कारण वो सब ही दिखाने-छापने को विवश है जो उसके 'आकाओं' को पसंद है ?


Alok Kumar, Senior Journalist & Analyst

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