पक्ष में रहे तो उचित, नहीं तो नाराजगी झेलो - यह कैसा न्याय है?

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एनडीटीवी (NDTV) पर छापे जैसी दमनात्मक कार्रवाई से क्या विरोध व बेनकाब करने वाली आवाजें दब-दबा दी जाएंगी ?

इमर्जेंसी से भी ज्यादा विषम परिस्थितियाँ हैं आज देश में लेकिन किसी मुगालते में न रहे मोदी सरकार कितनी आवाजें दबाओगे ?

जो ठक्कुरसुहाती न करे उस पर छापा और जो जेल की हवा काट चुका हो, जिस पर माननीय न्यायालय ने तल्ख टिप्पणियाँ की हों उसे उच्च-श्रेणी का सुरक्षा घेरा ?

मीडिया का कर्तव्य है व्यवस्था व सरकार को आईना दिखाना और आईने में अपना चेहरा-चाल व चरित्र देखने से भड़कने वाली सरकार आखिर कब तक खैर मनाएगी ?

नियम-कानून को तोड़-मरोड़ कर अपने पक्ष में की गई व्याख्या को ही सही मानने / बताने वाला अघोषित आपत्तकाल का ये दौर आखिर कब तक जारी रहेगा ?

समय भयावह है, देश भर में एकांगी व अलगाववादी विचारधारा की पोषक भगवा सरकार व उसकी नीतियों - कार्यशैली की आलोचना करने वाले पत्रकारों व मीडिया-समूहों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है, उनके काम में बाधा डाली जा रही है, उन्हें धमकाया जा रहा है, बेवजह झूठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है. सोशल-मीडिया और सच्चे लोकतन्त्र की हिमायती चंद संस्थाओं-संगठनों के तमाम प्रयासों के बावजूद आत्म-मुग्धता व हिटलरी मानसिकता से चूर मोदी सरकार अंध-समर्थन नहीं करने वाली मीडिया का क्रूर दमन कर रही हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी अपनी वर्ल्ड रिपोर्ट २०१७ में कहा है "भारत में सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाली मीडिया और नागरिक समाज समूहों पर दबाव बढ़ा दिया गया है. आलोचकों, जिनको अक्सर राष्ट्र विरोधी बताया जाता है, पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार राजद्रोह और आपराधिक मानहानि कानूनों का लगातार दुरुपयोग कर रही है."

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का अपने तरीके से उपयोग करने की कोशिश की जा रही है, पक्ष में रहे तो उचित, नहीं तो नाराजगी झेलो - यह कैसा न्याय है ?  


 Alok Kumar, Senior Journalist & Analyst

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