दिखावे वाली विकास का गणित

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नीतीश खुद को विकास पुरुष’ के रूप में चाहे जितना पेश करें लेकिन उन्होंने विकास का कोई नयाज्यादा समावेशीऔर टिकाऊ मॉडल नहीं पेश किया है। उनकी विकास नीति किसी भी रूप में केन्द्र की यूपीएसरकार से अलग नहीं है।

बिहार में नीतीश कुमार के विकास के दावे आधी हकीकत और आधा फ़सानाके ऐसे उदाहरण हैं जिनके आधार पर उनकी विकास पुरुषकी छवि गढ़ी गई है। इन के दावों को बारीकी और करीब से देखने पर ही यह स्पष्ट हो पाता है कि उनमें कितना यथार्थ है और कितना मिथ्य ?

उनके दावों की सच्चाई क्या है ? बिहार में नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार की जीडीपी वृद्धि दर (०५-०६ में ०.९२ फीसदी, ०६-०७ में १७.७५ फीसदी, ०७-०८ में ७.६४ फीसदी, ०८-०९ में १४.५८ फीसदी, ०९-१० में १०.४२ फीसदी, १०-११ में १४.७७ फीसदी और ११-१२ में १३.१३ फीसदी) जरूर चमत्कारिक और हैरान करनेवाली दिखती है लेकिन वह न सिर्फ एकांगी और विसंगत वृद्धि का नमूना है बल्कि आंकड़ों की बाजीगरी है।

असल में, यह बिहार की अर्थव्यवस्था के अत्यधिक छोटे आकार में हो रही वृद्धि का नतीजा है जिसे अर्थशास्त्र में "बेस प्रभाव" कहते हैं चूंकि बिहार की जीडीपी का आकार छोटा है और उसकी वृद्धि दर भी कम थी, इसलिए जैसे ही उसमें थोड़ी तेज वृद्धि हुई, वह प्रतिशत में चमत्कारिक दिखने लगी है। बिहार की मौजूदा आर्थिक वृद्धि दर न सिर्फ एकांगी और विसंगत है बल्कि वह अर्थव्यवस्था के सिर्फ कुछ क्षेत्रों में असामान्य उछाल के कारण आई है।

उदाहरण के लिए, बिहार की आर्थिक वृद्धि में मुख्यतः निर्माण क्षेत्र यानी रीयल इस्टेट में बूम की बड़ी भूमिका है। यही नहीं, इस तेज वृद्धि दर के बावजूद बिहार की प्रति व्यक्ति आय २००५-०६ में ८३४१ रुपये थी जो नीतिश कुमार के कार्यकाल के दौरान बढ़कर २०१०-११ तक २००६९ रुपये तक पहुंची है।

अब अगर इसकी तुलना देश के कुछ अगुआ राज्यों की प्रति व्यक्ति आय से करें तो पता चलता है कि हरियाणा के ९२३८७ रूपये, पंजाब के ६७४७३ रुपये, महाराष्ट्र के ८३४७१ रुपये और तमिलनाडु के ७२९९३ रुपये से काफी पीछे है।

इसका अर्थ यह हुआ कि अगर बिहार में जीडीपी की यह तेज वृद्धि दर इसी तरह बनी रहे और अगुआ राज्य भी अपनी गति से बढ़ते रहे तो देश के अगुवा राज्यों तक पहुंचने में बिहार को अभी कम से कम दो दशक और लगेंगे।

लेकिन इससे भी जरूरी बात यह है कि बिहार में मौजूदा विकास वृद्धि के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां औद्योगिक विकास खासकर मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में कोई विकास नहीं है और बुनियादी ढांचे खासकर बिजली के मामले में स्थिति बद से बदतर है। इसी तरह कृषि में भी अपेक्षित वृद्धि नहीं दिखाई दे रही है बल्कि निरन्तर ह्रास हो रहा है। ऐसे और भी कई तथ्य हैं जो बिहार में तेज आर्थिक विकास की विसंगतियों की सच्चाई सामने लाते हैं।

लेकिन अगर एक मिनट के लिए उनके दावों को स्वीकार भी कर लिया जाए तो असल सवाल यह है कि तेज वृद्धि दर के बावजूद बिहार में मानव विकास का क्या हाल है ? क्या इस तेज विकास का फायदा भोजन, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार आदि क्षेत्रों और राज्य के सभी इलाकों और समुदायों को भी मिला है ? नीतीश उन्हीं दिखावे वाली विकास के गणित को पेश कर रहे हैं जो गरीबों को बाईपास करके निकल जाने के लिए जानी जाती है। सच यह है कि उन्होंने बहुत चतुराई से सतही विकास को अपनी छवि गढ़ने के लिए इस्तेमाल कर लिया है लेकिन उसके नकारात्मक नतीजों का ठीकरा सदैव दूसरों पर फ़ोड़ते नजर आते हैं। विशेष राज्य की मांग इसी खेल का हिस्सा है।

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