वर्तमान बिहार - एक समीक्षा

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देश में कई सुधारों के लिए अग्रणी बिहार का पतन आजादी के कुछ सालों बाद ही शुरूहो गया था । लेकिन 1989 में गैर कांग्रेसवाद सामाजिक न्याय के नाम पर और मण्डलकमीशन के रथ पे आरूढ़ हो कर सत्ता के सिंहासन पर आए लालू प्रसाद यादव जी और उनकेकुनबे ने बिहार की हालत बद से बदतर कर दी ।

 

2005 में बिहार में परिवर्तन का दौर फिर शुरू हुआ। बिहार में लालू का जंगल राज खत्म हुआ और एक नया दौर शुरू हुआ। गैर कांग्रेसवाद की एक और ऊपज और लालू यादव जी के पूर्व के हमसफ़र व रणनीतिकार नीतीश कुमार जी सत्ता में आ गए। निश्चित तौर पर नीतीश कुमार जी के द्वारा , उनके प्रथम कार्यकाल में, बिहार में कुछ मूलभूत परिवर्तन हुआ था । बिहार में कानून व्यवस्था का राज आया था । सड़कों की हालत सुधरी थी। स्कूलों की हालत में कुछ सुधार हुआ था। लोगों के लिए स्वास्थ्य - सेवाओं में सुधार किया गया था । उस समय जो भी व्यक्ति बिहार आता था, उसे सुधार बिहार में नजर आता था ।

लेकिन नीतीश कुमार जी के दूसरे कार्यकाल में अचानक परिस्थितियाँ भिन्न हो गईं और इसके साथ-साथ बिहार में बुराईयों का प्रचलन चल पड़ा । शायद अपार बहुमत से उभरा दंभ और खोखला आत्म-विश्वास इस के मूल में हो । बिहार में भ्रष्टाचार का मानक बदला। मतलब आम लोगों को काम कराना महंगा हो गया। आज कारपोरेट स्टाइल भ्रष्टाचार ने बिहार में अपनी जड़ें जमायी हैं। ब्यूरोक्रेसी के साथ-साथ नेता भी पैसे वसूलने में जुटे हैं। निश्चित तौर पर कई महकमे बिहार में ऐसे हैं, जहां पर सीधे मंत्री संबंधित अधिकारियों से पैसे मांग रहे हैं।

नीतीश राज के कई मंत्रियों, नेताओं और नौकरशाहों के पास बेहिसाब संपत्ति है। इन मंत्रियों, राजनेताओं और नौकरशाहों की व्यावसायिक प्रतिबद्धताएँ बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को मात देने में सक्षम हैं । आज के समय में राजधानी पटना एवं प्रदेश के अन्य शहरों में रीयल-स्टेट , बड़े अस्पताल या बड़े मॉल्स के निर्माण में पूँजी-निवेश का मूल स्रोत इनका पैसा ही है । कॉरपोरेट में दो नंबर का पैसा कैसे निवेश करना है, वो बिहार के मंत्रियों , नेताओं और नौकरशाहों को अब भली-भाँति आ गया है।

बिहार में शहरी विकास की हालत काफी खराब है। शहरी विकास के नाम पर न तो सीवरेज है, न साफ पानी है, न ही शहरों में सक्षम और क्रियाशील नगर-पालिका है। सारे शहरों में खुले नालों से मुक्ति लोगों को नहीं मिली है। कई शहरों में बड़े शहरों की देखा-देखी अपार्टमेंट और फ्लैट कल्चर तो विकसित हो गया, लेकिन उसे संभालने के लिए शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। इन सब के बाबजूद होल्डिंग-टैक्स , रजिस्ट्री -शुल्क इत्यादि में अप्रत्याशित वृद्धि कहीं से भी तर्क-संगत और जनहित में नहीं है

अब बात गांवों की। गांवों को निश्चित रूप से सड़कों से जोड़ा गया है लेकिन अपने निर्माण के चंद वर्षों / महीनों के अन्दर उनकी दुर्दशा निर्माण की गुणवत्ता पर प्रश्न खड़े करती है, गांवों के अंदर सैनिटेशन की हालत आज भी खराब है। इस पर बिहार सरकार का कोई ध्यान नहीं है। रही बात बिजली की, आज बिहार में बिजली की हालत कमोबेश वही है, जो पूर्व के शासन काल में थी । प्रदेश की राजधानी में भी बिजली की हालत अच्छी नहीं है। बिजली की दर महानगरों के बराबर है लेकिन फिर भी बिजली -आपूर्ति से जुड़ी संरचनाएं बदहाल हैं l बिजली विभाग के अंतर्गत आनेवाली होल्डिंग कंपनियों में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है

विकसित हो रहे बिहार में एक नई बात सामने आई है और जो अब झलकने भी लगा है मीडिया पर जबरदस्त सरकारी नियंत्रण। सच्चाई क्या है? मैं इससे भिज्ञ हूँ। ये बिहार के हित में नहीं है। शुरू से लोकतंत्र के लिए लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले राज्य के मुखिया पर ही मीडिया पर कब्जा करने का आरोप लग रहा है। खबरें बताती हैं कि सरकार विरोधी खबर लिखने वाले पत्रकार या तो नौकरी से निकाले जा रहे हैं या उनका तबादला हो रहा है।

वैसे भी मीडिया घरानों और सरकार की बीच के संबंध कोई नयी बात नहीं है। ये हमेशा से "अन्दर की बात" रही है । मेरे व्यक्तिगत विचार में प्रिंट मीडिया बिहार में अपनी रचनात्मक और सकारात्मक भूमिका भूल चुका है और प्रभात खबर इसमें अव्वल साबित हो रहा है । अँग्रेजी में एक कहावत है ना "If rape is inevitable , lie down and enjoy it" (अगर बलात्कार को टाला नहीं जा सकता तो उसका मजा लीजिए)।

मेरे अनुसार इस मुहावरे का भावार्थ यही है कि "अशक्त प्रतिरोध से जटिलताएँ पैदा होती हैं और अगर विषमताओं को हम टाल नहीं सकते तो विरोध व्यर्थ है।"

बिहार की जनता शायद इसी का अनुसरण कर रही है। पूर्व के शासन के घावों को कुरेद कर और उनसे डर पैदा कर "जन-मानस रूपी अचानक बिदकने वाले घोड़े" को कैसे मायाजाल में उलझा के रखना है, इस मामले में नीतीश कुमार जी शायद देश के बाकी मुख्यमंत्रियों से काफी आगे निकल चुके हैं।

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