बिहार में आतंकवाद

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बिहार में आतंकवाद का फलना-फूलना सामाजिक परिवेश से तालुक्क नहीं रखता हैसामाजिक परिवेश में समरसता की कौन सी परिभाषा आतंकवाद के पोषण और अनदेखी की बात करती हैदोनों भिन्न मूद्दे हैं l

 

बिहार या देश के किसी भी कोने में आतंकवाद जैसा संवेदनशील मुद्दा अगर अपने पाँव पसार रहा है तो ये सिर्फ और सिर्फ शासन की उदासीनता व अनदेखी का परिणाम है और ये सब भली-भाँति जानते हैं कि उदासीनता व अनदेखी के पीछे सिर्फ और सिर्फ वोट-बैंक के हितार्थ तुष्टीकरण की राजनीति काम रही है l

पिछले एक दशक में देश भर में हुए अधिकांश आतंकी घटनाओं के तार बिहार से जुड़े रहे हैं l खुफिया -एजेंसियां लगातार प्रदेश की सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट करती रही हैं, मीडिया में आतंकवाद के बिहार -मोड्यूल (दरभंगा-मधुबनी मोड्यूल) की अनवरत चर्चा होती रही है l

बावजूद इन सब के बिहार की सरकार की द्वारा इस पर गंभीरता से कोई कार्रवाई का नहीं किया जाना, सरकार की विश्वसनीयता व नीयत पर सवाल तो जरूर खड़े करती है l

बोध गया धमाकों के बाद एन.आई.ए. (NIA) के इनपुट्स से आँखें मूँद लेना क्या जान-बूझ कर की गई अनदेखी नहीं है? आतंकियों की 'नर्सरी ' कैसा बना गया बिहार? क्या इसका जवाब देना चाहेगी बिहार की 'तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सुशासनी सरकार'?

हाल के दिनों में देश की विभिन्न जगहों से गिरफ्तार हुए १७ आतंकियों में से १५ बिहार के ही रहने वाले हैं l अब तक पकड़े गए बिहारी आतंकियों में तसनीम अख्तर उर्फ मोनू , असदुल्ला रहमान उर्फ दिलकश, कफहल अहमद, ताल्ला आब्दाली उर्फ इसरार, मो. तारिक अंजुमन, मारूण रसीद नायक, नकी अहमद, वसी अहमद शेख, गोहर अजीज खुमैनी, मो. आदील, मो. इरशाद, गयुर अहमद, आफताब आलम उर्फ फारूक इत्यादि देश की अलग-अलग जेलों में कैद हैं l कर्नाटक के भटकल और यूपी के आजमगढ़ के बाद आतंकवाद का दरभंगा मॉडयूलदेश भर में सबसे खौफनाक चेहरा रखने लगा है

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