नैतिकता की आड़ में इस्तीफे की नौटंकी का सच

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नैतिकता की आड़ में इस्तीफे की नौटंकी का सच नैतिकता कीदुहाई देने वाले नीतीश खुद विरोधाभास की राजनीति के द्योतक हैं। यदि नैतिकता केआधार पर त्यागपत्र देना ही था तो उन्हें उस वक्त ही दे देना चाहिए था जब उन्होंनेभाजपा से गठबंधन तोड़ा था क्यूँकी जनमत सिर्फ उनके अकेले के लिए नहीं था ।

 

उस वक्त त्यागपत्र देना ही सही अर्थों में नैतिक होता क्योंकि उस अपार जनमत के पीछे भाजपा के समर्पित कैडर की भी अहम भूमिका थी । लेकिन उस वक्त तो नीतीश को नैतिकता का स्मरण नहीं हुआ और उन्होंने कांग्रेस के समर्थन के सहारे सरकार बचाना जरूरी समझा।

यहाँ एक और अहम बिन्दु द्रष्टव्य है कि अपनी इस्तीफे के बाद एक डमी-मुख्यमंत्रीकी सरकार को विधान-सभा में बहुमत हासिल कराने के लिए फिर से नीतीश उसी काँग्रेस के समर्थन के मोहताज हैं जिसका चुनावों के दौरान उन्होंने पुरजोर विरोध किया था l ये नीतीश की नैतिक राजनीति का अनूठा मोड्यूल है जिसमें सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए परोक्ष या अपरोक्ष रूप से किसी के भी सहारे व समर्थन से कोई गुरेज नहीं है l

जहाँ तक तक प्रदेश में लोकसभा चुनाव में मतदाताओं द्वारा नीतीश और उनकी पार्टी को ठुकराए जाने के बाद नैतिकता के नाम पर इस्तीफा देने की बात है तो नैतिकता का तकाजा था कि नीतीश विधानसभा भंग कर चुनावों के जरिए फिर से जनता के सामने जाते। चुनाव में मतदाता किसी के भी पक्ष में अपना फैसला दे सकते हैं, ये फैसले पक्ष में हों या विपक्ष में, उनका सम्मान करना ही लोकतांत्रिक भावनाओं के प्रति नैतिक-निष्ठा मानी जाती है ना की नैतिकता का दिखावा कर सत्ता का प्रपंच रचना

दरअसल लोकसभा चुनावों में अपनी साख खोने के बाद नीतीश अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर के चिंतित हैं इसीलिए उन्होंने अपनी पार्टी के अपने समर्थक प्रवक्ताओं के जरिए सभी गैर भाजपा पार्टियों को एकजुट होने का आह्वान तक करवा डाला। इस सन्दर्भ में नीतीश ने लालू यादव तक के दरवाजे खटखटाए l उन्होंने नैतिकता को ताखे पर रखकर उस राजनीति तथा आरजेडी से भी परहेज नहीं किया जिसे जंगल-राज, भ्रष्टाचार और पिछड़ेपन का प्रतीक बताकर उन्होंने सत्ता हासिल की थी और लोकसभा का चुनाव लड़ा था।

असल में भाजपा के विजय और जे.डी.(यू) के सफाए से नीतीश खौफजदा हैं और इस बात को भली-भांति समझ पा रहे हैं कि बिहार की जनता ने उनके सेक्युलर-कम्यूनल राजनीति के बेसुरे राग को सिरे से नकार दिया है । अपने विधायकों और पार्टी में उभर रहे असंतोष और विरोध के स्वर (जिस पर अपने इस्तीफे के द्वारा अभी पर्दा डालते देख रहे हैं नीतीश) का मतलब बखूबी समझ रहे हैं नीतीश l जे.डी. (यू) का एक बड़ा धड़ा नीतीश से सवाल पूछ रहा है कि इस खिसक चुकी जमीन पर खड़े हो कर क्या विधानसभा चुनावों में भाजपा का सामना किया जा सकता है?

बहरहाल बिहार की राजनीति में इस वक्त बौखलाहट और निराशा के शिकार जे. डी. (यू) ले लोग किंकर्तव्य-विमूढ़ता की स्थिति में हैं। उन्हें अपने अस्तित्व पर खतरा दिखाई पड़ रहा है इसीलिए वे नीतीश के नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं, जिसका पटाक्षेप नीतीश नैतिकता की दुहाई देकर अपनी छवि सुधारने के लिए इस्तीफे की ड्रामेबाजी के साथ करते दिख रहे हैं l

सच्चाई यही है कि गठबंधन तोड़ने के बाद हुई पहली चुनावी-परीक्षा में फेल नीतीश पर जबर्दस्त दबाव है, सभी नीतीश पर दोषारोपण कर रहे हैं क्यूँकि गठबंधन तोड़ने का एकतरफा फैसला नीतीश ने बिना अपनी पार्टी को विश्वास में लिए हुए किया था l इसीलिए नैतिकता की आड़ में ब्लैकमेल करने के लिए और अपने बिखरते हुए कुनबे को एकजुट करने की कवायद में नीतीश को विवश होकर त्यागपत्र की नौटंकी करनी पड़ी।

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