बिहार में सरकार की अनदेखी से बढ़ता इंसेफेलाइटिस का कहर

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बिहार में इंसेफेलाइटिस का कहर हरेक साल की तरह इस साल भी जारी है बिहार सरकार की मानें तो अब केवल ४०-५० मौतें हुई हैं जबकि मुजफ्फरपुर और गया के भिन्न इलाकों में मौजूद पत्रकार मित्रों व सूत्रों के अनुसार संख्या इससे कहीं ज्यादा है लगभग १०० के करीब l

 

बिहार सरकार की निद्रा तो २५ मौतों के बाद ही टूटी और विगत वर्षों में भी ऐसा ही होता आया है l ज्ञातव्य है कि पिछले वर्ष भी राज्य के विभिन्न इलाकों में इस बीमारी से २५० से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी । इस बीमारी की रोकथाम के लिए बीमारी से ग्रस्त होने के पूर्व सही समय पर टीकाकरण ही एकमात्र उपाय है जिसकी कोई समुचित व्यवस्था सरकार के द्वारा कभी नहीं की गई है l मौतों का सिलसिला जब जारी होता है तब सरकार 'Panic-Button' दबाती हैl

सूबे के मुख्यमंत्री, मंत्री एवं आलाधिकारी प्रभावित क्षेत्रों में जाने की बजाए हस्पतालों का दौरा कर एवं दिखावे के नियंत्रण कक्ष की शुरुआत कर अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड लेते हैं l विपक्षी दल के लोगों की राजनीति का मुद्दा बन कर रह जाती हैं मासूमों की मौतें l हरेक साल मौतों के पश्चात सरकार ये कहती है कि विशेष टीकाकारण अभियान चलाया जायेगा लेकिन सच्चाई ये है कि ऐसे अभियान सरकारी फाइलों में ही चलते हैं l

पिछले वर्ष भी केन्द्र सरकार के निर्देश पर बिहार के १४ जिलों में इस बीमारी की रोकथाम के लिए २५ नवम्बर से १९ दिसम्बर तक विशेष टीकाकारण अभियान चलाने की बात कही गई थी लेकिन ये अभियान कहाँ और कैसे चला ये बेहतर सरकार और उसके नुमाइंदे ही बता सकते हैं । इस कथित २४ दिवसीय विशेष टीकाकरण अभियान के तहत १ वर्ष से १५ वर्ष तक के सभी लक्षित बच्चों को टीका दिया जाना था लेकिन अगर प्रभावित जिलों के लोगों की मानें तो उन्हें ऐसे किसी अभियान की जानकारी भी नहीं मिली । यह विशेष अभियान समस्तीपुर, अररिया, अरवल, सीवान, बांका, बक्सर, भागलपुर, भोजपुर, नालंदा, नवादा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, पूर्वी चम्पारण और पश्चिम चम्पारण जिलों में चलाया जाना था । सिर्फ समस्तीपुर जिले में १४ लाख बच्चों को टीकाकरण करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था लेकिन हकीकत ये है कि इन १४ जिलों को मिला कर भी इस एक जिले का आँकड़ा(१४ लाख) हासिल नहीं किया जा सका l

मुजफ्फरपुर में मौजूद लोगों और पीड़ितों के परिजनों का कहना है कि "अगर बीमार बच्चे सरकारी हस्पतालों के भरोसे रहते तो मृतकों की संख्या कई गुणा ज्यादा होती, भला हो केजरीवाल हस्पताल का जिसकी मदद से अनेकों मासूमों की जान बचाई जा सकी l"

विशेषज्ञों के अनुसार सरकार की अनदेखी और कुपोषण के कारण यह बीमारी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार तो हर साल पूरे देश में इस बीमारी से केवल पांच से छह सौ बच्चे ही मरते हैं जबकि हकीकत कुछ और ही है। इंसेफेलाइटिस के कहर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वास्तव में तीन दशकों में इन्सेफेलाइटिस से उत्तर-पूर्वी राज्यों में ५०००० से अधिक जानें जा चुकीं है। वहीं इस बीमारी से लकवाग्रस्त हुए लोगों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं रखा जाता है ।

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