भैंस के आगे बीन बजाए भैंस खड़ी पगुराए

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सामान्य रहन-सहन में भी एक प्रचलन काफी आम होता है कि लोग अपने drawing room को काफी साफ-सुथरा और सजा-संवार के रखतेहैं भले ही घर के बाकी हिस्से अस्त-व्यस्त ही क्यूँ ना हों किसी प्रदेश की राजधानी भी उस प्रदेश की drawing room सरीखी ही होती है और इसका मुजाहिरा देशके गरीब से गरीब व अति-पिछड़ा राज्यों की राजधानियों में होता है l

 

नजर दौड़ाने पर, सुशासन के लाख दावों के बावजूद, बिहार ही एकमात्र राज्य दिखता है जिसकी राजधानी गंदगी और कुव्यवस्था के नित्य नए माप-दण्ड स्थापित करती दिखती है l साफ-सुथरा परिवेश, सैनीटेशन, प्रभावी ड्रेनेज सिस्टम, सीवरेज, कचड़ा-प्रबंधन एवं एक सुचारु व सक्रिय नगर-पालिका जनता की मूलभूत जरूरतें हैं जो आम जनता के जीवन पर अपना बहुआयामी प्रभाव छोड़ती हैं l

बिहार के पिछले नौ सालों के बहुप्रचारित शासन-काल की ही अगर बात की जाए तो उल्लेखित मदों पर सरकारी-कोष से पैसा पानी की तरह बहाया गया लेकिन सुधार होने की बजाए परिस्थितियाँ बद से बदतर ही होती गयीं; अनेक अवसरों परमाननीय न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ाl माननीय न्यायालय ने तल्ख टिप्पणियाँ भी कीं लेकिन ना तो 'मोटी चमड़ी वाली सुशासनी सरकार के पुरोधाओं पर इसका कोई असर हुआ, ना ही 'भैंस के आगे बीन बजाए भैंस खड़ी पगुराए' कहावत को चरित्रार्थ करते सरकारी-मातहतों पर l

पूरी राजधानी में जिसकी आबादी अब तीस लाख से ऊपर की है, सिर्फ 76 कूड़े-दानों की व्यवस्था है जिनका भी नियमित उठाव नहीं होता हैl घरों से कूड़ा एकत्र करने और शहर की सफाई के लिए एक संस्था A to Z को जिम्मा दिया गया था लेकिन वर्षों तक सरकार से कोई भुगतान नहीं मिलने के कारण उस संस्था ने काम ही छोड़ दिया l ऐसे में जनता कहाँ कूड़ा फेंके?

राजधानी में कूड़ा-उठाव की औपचारिकता दिखाने के लिए वीआईपी इलाकों का कूड़ा उठाकर पटना बाइपास और पटना-गया हाइवे पर ठीक सड़क किनारे डम्प कर दिया जा रहा है l अब तो कूड़े को बेरिया में, घनी आबादी के बीच बने डम्पिंग हाऊस तक भी नहीं पहुँचाया जा रहा है l कूड़े-कचरे का अम्बार सर्वत्र व्याप्त है राजधानी पटना में और ये "लैंड-मार्क" का काम भी बखूबी निभाते हैं l

ये कोई नई समस्या नहीं है और इसके पीछे "विपक्ष का तथाकथित हाथ" भी नजर नहीं आता है l बिहारके किसी भी नगर निगम क्षेत्र में नियमित कूड़ा उठवाने के लिए नगर निगम प्रशासन के पास पर्याप्त संसाधन नहीं है l राजधानी पटना का कोई भी ईलाका, 'सुशासनी खेवनहारों' के इलाके को छोड़कर, ऐसे "खूबसूरत नजारों" से अछूता नहीं है l इन "दर्शनीय पर्यटनस्थलों" पर आवारा पशुओं, कुत्तों और सूअरों का जमावड़ा तो देखते बनता है और हमें अपनी "जड़ों से जुड़े रहने" का अद्भुत अहसास दिलाता रहता है...!!!

राज्य के बाकी शहरों के बारे में क्या कहना..?? "ट्रेलर देख कर पूरी "फ़िल्म" का अंदाजा लगाया जा सकता है....!! पटना के ह्स्पताल और नर्सिंग होम वालों का कहना है "भला हो सुशासन का... अब "एनिस्थिसिया वालों" (मरीजों को बेहोश करने वाले) को ज्यादा परेशानी नहीं आती; मरीज आने से पहले ही आधी बेहोशी में रहते हैं l"

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