छद्यम पहचान बनाने को लालायित रहने वाले नीतीश जी से चन्द प्रश्न

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सार्वजनिक मंचों पर और विशेषकर जब चुनाव नजदीक आते हैं तो नीतीशकुमार "जाति-बंधन तोड़ने वाले"के रुप में अपनी 'छद्यम पहचानबनाने को लालायितदिखते हैं और अपने समालोचकों को उनकी सच बयानी पर आड़े हाथों भी लेते हैं l

 

नीतीश जीके बारे में सबसे बड़ी सच्चाई तो यही है कि वे खुद मंडल कमीशन के "पौरुष" से उत्पन्नहुए हैं। क्या बिहार की जनता इस सच को नहीं जानती कि वर्ष १९९४ के पहले वे किसकेसाथ थे और आज फिर से किसके साथ हैं? आज नीतीश जिनके शरणागत हैं उनकी राजनीति कामुख्य आधार क्या था और क्या हैइससे भी हर कोई वाकिफ है l क्या नीतीश इस सच कोझुठला सकते हैं कि जब 'भूरा बाल साफ करो' जैसा घृणित, द्वेषपूर्ण और सामाजिकसमरसता को विखंडित करने वाला बयान आया था तो इनके 'मुखार-वृंद ' से भर्त्सना का एकशब्द भी नहीं निकला था?

क्या नीतीश आज इस प्रश्न का जवाव देने की स्थिति में हैंकि जिस लालू यादव को १९९४ में एक समाचार-पत्र को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने 'जातिवादी और नव-ब्राह्मणवादी' बताया था और कहा था कि "लालू सिर्फ अपनी जाति यादवको सत्ता के केंद्र में रखना चाहते हैं और बाकी जातियों को हाशिए पर रखना चाहते है , उन्हीं के समक्ष आज घुटने टेकने को वो क्यों विवश हो गए?

क्या श्री कुमार इस बातसे इन्कार करने का साहस कर सकते हैं कि उन्होंने ही मंडल कमीशन लागू होने के बाद "आरक्षण सिर्फ पिछड़ी जातियों का हक" की बात कही थी? क्या १९९४ में जनता दल केविभाजन के पश्चात नीतीश के द्वारा समता पार्टी के गठन के पीछे की मंशा सिर्फ औरसिर्फ बिहार के पिछड़ी जातियों के मतों में विभाजन की नहीं थी?

क्या ये सच नहीं हैकि अपने मुख्य-मंत्रित्वकाल में पूरे प्रदेश को नजरंदाज कर अपने गृह-जिले औरविशेषकर राजगीर में महती - परियोजनाओं का अम्बार लगाने के पीछे भी नीतीश की मंशासिर्फ और सिर्फ स्वजातीय-वोटरों पर अपनी पकड़ कायम करने की थी?

क्या नीतीश इस सचको नकार सकते हैं कि उनके शासनकाल में प्रदेश की नौकरशाही में व सूबे के अन्यमहत्वपूर्ण ओहदों पर उनके स्वजातीय लोगों को चुन-चुन कर बैठाया गया?

क्या ये सच नहीं है कि नीतीश ने अपने शासनकाल में सूबे की वास्तविक रूप से अत्यंत पिछड़ीजातियों व दलित समुदाय को अपनी जाति के आगे करीब-करीब बौना ही रखा और समाजवाद वजेपी के सपनों के उल्ट जाति की राजनीति का सबसे गंदा खेल खेला? मंडल कमीशन की बातयदि आज के संदर्भ में पुरानी और अप्रसांगिक लगे तो बिहार में सवर्ण आयोग के गठन केउदाहरण को ही लें। अब क्या श्री कुमार इस बात से भी इन्कार कर सकते हैं कि इसअजीबोगरीब आयोग का गठन उन्होंने सिर्फ सवर्णों का वोट हासिल करने के लिए नहीं किया था?

अजीबोगरीब इसलिए कि यह आयोग अपने गठन के अनेकों सालों के अस्तित्व के बाद भीबिहार में न तो गरीब सवर्ण ढुंढ सका है और न ही उसने कोई अंतरिम सिफ़ारिश ही की l लोकसभा चुनावों के प्रचार के दौरान नीतीश जी की ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरदयादव ने कहा था कि "लालू-नीतीश ने बस जाति की राजनीति की और ये दोनों जात-पात सेऊपर नहीं उठ सके" l

शरद यादव के इस बयान पर अपनी सफाई पेश करने की हिम्मत नीतीश अबतक क्यूँ नहीं जुटा सके? क्या नीतीश जी के महादलित फॉर्मूले का जाति की राजनीति सेकोई सरकोर नहीं था? क्या किसी भी चुनाव में प्रत्याशियों के चयन में नीतीश जातिगतसमीकरणों से ऊपर उठ सके?

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