कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्तता का चीनी प्रस्ताव – आखिर क्यों?

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देश के विभाजन के मात्र एक वर्ष बाद १९४८ में जब पाकिस्तानी जिहादियों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया तो कश्मीर के राजा हरि सिंह के लिए यह फैसला करना आसान हो गया की कश्मीर का भविष्य हिंदुस्तान का अभिन्न हिस्सा हो जाने में ही है.  उनके बुलाने पर हिंदुस्तान की सेना ने जिहादियों के बढ़ते कदमों को रोक दिया. युद्ध-विराम के वक़्त जो जहाँ था वहीँ एक लाइन-ऑफ़-कंट्रोल बन गयी. उस दिन से आज तक कश्मीर घाटी पर पाकिस्तान भूखे कुत्ते की तरह नज़र गड़ाये बैठा है. गत ६९ सालों में भारत ने किसी और देश को मध्यस्तता करने नहीं दिया. इतने सालों बाद एकाएक चीन के दिल में कहाँ से ये सौहार्द जगा की वह अपनी मुंह लिए कश्मीर में मध्यस्तता का प्रस्ताव ले कर चला आया?

मध्यस्तता के इस प्रस्ताव को भारत ने ठुकरा दिया.  ये तो जानी हुई बात थी.  पर जो देश एक तरफ भूटान में सेना भेज कर अतिक्रमण करने में लगा हुआ है, उसके पास मध्यस्तता करने और बिचौलिया बनने का मुंह की कहाँ है?  चीनी निर्लज्ज हैं.  जिन लोगों ने अपने सदियों पुरानी संस्कृति को अपनी कमजोरी समझ कर उसकी तिलांजलि दे दी, उनकी आत्मा तक बिकाऊ हो गयी है. उन्होंने अपने को टिड्डियों की फ़ौज जैसा बना लिया है. कहते हैं व्यापारी लोग किसी से बिगाड़ नहीं रखते क्योंकि उससे धंधा ख़राब होता है, पर चीन अपने आप को ईस्ट इण्डिया कंपनी के तरह ढाल रहा है जो अपने जोर से व्यापार करती थी.  रोचक बात यह है कि चीन आज जो कर रहा है, वही चीज़ ईस्ट इण्डिया कंपनी ने उसके साथ “दी ग्रेट ओपियम वार्स” में की थी. अँगरेज़ हिंदुस्तान में जबरदस्ती किसानों से अफीम उगवाते थे, और उस अफीम को चीन में बेचते थे.  बिहार में उगाये हुआ सारा अफीम को पटना सिटी में पटना साहिब गुरूद्वारे के निकट गंगा किनारे के गोदाम में जमा किया जाता था और फिर स्टीमर द्वारा निर्यात के लिए कलकत्ता ले जाया जाता था.  चीन के सम्राट ने अफ़ीम लेने से इंकार कर दिया तो अंग्रेज़ों ने चीन पर धावा बोल दिया.  चीन की हार हुई और अँगरेज़ चीन में अफ़ीम का कारोबार तेजी से बढ़ाते गए.  यह बात १८३९ की है. 

Indo-China borderIndo-China borderवही चीन आज प्लास्टिक की बाल्टी और किराना की अन्य वस्तुओं के व्यापार के मुनाफे से इतना मदमस्त हो गया है की बाकी विश्व में गुंडागर्दी करता फिर रहा है. चीन जिन देशों को सामान बेचता है, उन्ही को आँखें दिखा रहा है, क्योंकि उसे डर है कि कोई दूसरी दूकान मोहल्ले में न खुले.  चीन से तंग आ कर सारे पाश्चात्य देश, जापान, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया आदि अब हिंदुस्तान को आगे बढा कर चीन का प्रतिद्वंदी बनाना चाहते हैं.  इसी कारण चीन भरसक कोशिश कर रहा है कि हिंदुस्तान की आंतरिक स्थिति और सीमा पर उथल पुथल रहे. ऐसे माहौल में राहुल गांधी का चीनी राजदूत से मुलाकात करना शर्मनाक और देशद्रोही हरकत मानी जा सकती है.

CPAC (चाइना-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरिडोर) के तहत चीन अपने फायदे के लिए पश्चिमी चीन से पाकिस्तान के गवादर बंदरगाह तक सड़क बना रहा है. इतनी लम्बी सड़क को सुरक्षित रखने के लिए चीन अपनी सेना भी लायेगा.  पाकिस्तान के पढ़े लिक्खे लोगों में यह डर समा गया है की चीन उन्हें निगलने वाला है. जो हाल उनलोगों ने वहां हिन्दुओं, सिक्खों और मसीहियों की कर रक्खी है, वही हाल उनका चीनियों के हाथों होने वाला है.  आधे निगले जाने के बावजूद पाकिस्तान के "मोमिन" लोगों को यह सर्पदंश मीठा लग रहा है. हिंदुस्तान से उनकी घृणा इतनी असीम है की उस घृणा ने उन्हें अँधा बना दिया है. खुद्कुश जिहादी का जिक्र आने पर हम किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं जिसमें इतनी घृणा होती है की वो दूसरों को मारने में खुद मर जाना उचित समझता है.  आज एक पूरा देश ख़ुदकुशी के कगार पर खड़ा है.  चीन का खंजर उसके मुंह में घुस कर उसके दूसरे छोर पर निकल गया है – और वह है जो बड़ा खुश है की इसमें चीन उनके जिहाद में उनका साथी बन गया है. वो सीली सीली घृणा के आग में जल रहे हैं और चीनी उनकी घृणा पे अपनी लिट्टी पका रहे हैं.

कश्मीर के संविधान की शुरुआत यों होती है:

"WE, THE PEOPLE OF THE STATE OF JAMMU AND KASHMIR,

having solemnly resolved, in pursuance of the accession of this State to India which took place on the twenty sixth day of October, 1947, to further define the existing relationship of the State with the Union of India as an integral part thereof, and to secure to ourselves-

JUSTICE, social, economic and political;

LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship;

EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among us all;

FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity of the nation;

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this seventeenth day of November, 1956, do HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE

TO OURSELVES THIS CONSTITUTION."

 - Preamble of Constitution of Jammu & Kashmir.

कश्मीर भारत का हिस्सा है यह तो निर्विवादित है. उसका अपना संविधान है जिसमें कहा गया है की वह भारत का अविभाज्य हिस्सा है. इसके अलावा परिग्रहण दस्तावेज (instrument of accession) भी इस बात की पुष्टि करता है.

पाकिस्तान पर कसता चीनी शिकंजा

पाकिस्तान के आम जनता को धीरे-धीरे पता चल रहा है कि किस तरह वे अपने चीनी रहनुमा के कर्ज के शिकंजे में फंस गए है. पाकिस्तान के टी. वी. चैनलों पर इसका जिक्र धीरे-धीरे आना शुरू हो रहा है. भारत से घृणा में लिप्त पाकिस्तानी मानसिकता जो चीनियों से सहवास के उन्माद में मदमस्त थी, अब यह महसूस कर रही है की चीनी दरअसल जोंक की तरह उनके खून को पी जायेंगे. यह डर हलके-हलके पाकिस्तानी अवाम में घर कर रहा है. चीन नहीं चाहता कि पाकिस्तान के अन्दर इस डर के कारण उसके खिलाफ कोई आवाज़ उठे. इसके लिए चीन की नयी चाल बनी की अगर वे कश्मीर में हस्तक्षेप की नियत दिखायेंगे तो एक गोली में दो शिकार मार लेंगे. पाकिस्तान खुद-ब-खुद उनके कसते शिकंजों को पनाह मान कर शांत रहेगा और हिंदुस्तान पर भी दबाव बना रहेगा.

हिंदुस्तान से चीन में बनी उत्पादों के बहिष्कार की बहुत सी आवाजें आ रही हैं. पाठक को यह जानना होगा कि चीन से व्यापर करने वाले देशों की सूची में भारत का स्थान शायद पहले दस में भी नहीं है.  पहली बात तो चीनी उत्पाद का पूर्ण बहिष्कार असंभव है, क्योंकि उनके ज्यादा विकल्प सुलभ नहीं हैं.  दूसरी बात यह है कि चीन को उस बहिष्कार से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा. अगर चीन को पराजय का मार्ग पर ले जाना है तो भारत को चीन का विकल्प बन कर अंतर्राष्ट्रीय बाजार के थाली में से खाना शुरू कर चीन के प्रतिद्वंदी के रूप में आगे आना होगा. हर मानक से तो यही प्रतीत होता है कि भारत सरकार देश को उसी दिशा में ले जाने के लिए कार्यरत है. इस प्रयास को बल देना भारत के लिए नितांत आवश्यक हो गया है.

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