One of the saddest and most overlooked tales in history is the demise of the Native American population during the late 1400s in North America. It could be argued that if the Native Americans were not already divided amongst themselves, they could have successfully resisted colonial efforts of the Europeans.

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During a recent trip to Bihar, I discovered that only fifty km from the capital city of Patna is a city and a district named after Bakhtiar Khilji, the ruthless killer who destroyed Nalanda and other centers of learning, burning over ten thousand scholars alive in the process.

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An era in political and social life of Bihar came to an end on December 19th with the passing away of Bihar's revered 'Bachchi Jee' (Kishori Sinha). It marked the end of a spectacular socio-political journey of more than seven glorious decades of a stateswoman who stood tall among her contemporaries.

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India is a sovereign, socialist, secular, and democratic Republic. Fortunately our democracy has been successful during all these years largely because of the fact that the people in general are secular, tolerant and law abiding. As a matter of fact, success of secular democracy, a sacred principle, depends on the wisdom and sagacity of the people. It is unfortunate that sometimes during elections people indulge in divisive activities based on religion, caste and creed.

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It has been almost a decade since it happened, but the horrors of the Bush presidency seem like they happened yesterday. It was a dark age in the history of America. War profiteers turned a terrorist attack into a global crisis which resulted in severe damage to humanity – both within and without the United States.

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Media has changed substantially over the last several decades. Sadly, despite the incorporation of new and advanced technologies that changed media for the better, the noble mission of media – especially its role in a democracy, appears to have gotten lost somewhere along the way.

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दीपावली की रात जेल से भागे 8 आतंकवादी जो कि प्रतिबंधित संगठन सिमी से ताल्लुक रखते थे उन्हें मध्यप्रदेश पुलिस  8 घंटे के भीतर मार गिराने के लिए बधाई की पात्र है । बधाई स्थानीय लोगों को भी जिन्होंने पुलिस की मदद कर के देशभक्ति का परिचय देते हुए किसी बड़ी आतंकवादी घटना रोकने में प्रशासन की मदद की। देश में यह एन्काउन्टर अपने आप में शायद ऐसा पहला आप्रेशन है जिसमें पुलिस ने फरार होने के आठ घंटों के अन्दर ही सभी आतंकवादियों को मार गिराया हो

इन सभी का बेहद संगीन आपराधिक रिकॉर्ड रहा है हत्या, लूट, डकैती से लेकर बम धमाकों तक ऐसा कोई काम नहीं जो इन्होंने न किया हो । इनमें से तीन आतंकी तो इससे पहले 30 सितंबर - 1 अक्तूबर 2013 की दरमियानी रात को खंडवा जेल  से भी भाग चुके थे और इन्हें  14 फरवरी 2016 को ओड़िशा के राउरकेला से दोबारा गिरफ्तार किया गया था

फरारी के दौरान इन आतंकवादियों ने 1 फरवरी 2014 आंध्र प्रदेश के करीमनगर इलाके में बैंक डकैती, 1 मई 2014 को चैन्नई रेलवे स्टेशन के बेंगलुरु  गुवाहाटी ट्रेन में धमाका, 10 जुलाई 2014 को पुणे के फरसखाना और विश्रामबाग पुलिस थानों में धमाके, 6 दिसंबर 2014 को रूड़की में एक रैली में धमाका ऐसी ही अनेकों वारदातों को अंजाम दिया था।

ऐसे में  जेल से फरार होने के बाद ये आठों किसी बड़ी आतंकवादी घटना को अंजाम नहीं देते ऐसा कैसे कहा जा सकता है ? कुल मिलाकर ये खूंखार कैदी  आम कैदी नहीं थे और इस देश के मासूम नागरिकों की जान की कीमत निश्चित ही इन आतंकवादियों की जान से ज्यादा है  इसलिये मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही अत्यंत ही सराहनीय है  लेकिन इस सब के बीच  इन आठ आतंकवादियों को जेल से भागने से रोकने के प्रयास में हमारे एक आरक्षक रामेश्वर यादव शहीद हो गए 

इस एन्काउन्टर पर सवाल उठाने वाले बुद्धिजीवियों से एक प्रश्न है कि जो आतंकवादी खाने की थाली को हथियार बनाकर उससे गला रेत कर एक औन ड्यूटी पुलिस कर्मचारी की हत्या कर सकते हैं  टूथब्रश से डुप्लिकेट चाबी बना सकते हैं और चादरों के सहारे 30 फीट ऊँची दीवार आसानी से फाँद कर भाग सकते हैं उन्हें जीवन दान देकर क्या हम अपने देश और उसकी सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं करते ? क्या हम भूल गए हैं कि जिस आतंकी अजहर मसूद को भारत के सुरक्षा बलों ने 1994 में गिरफ्तार किया था उसे 1999 में अपह्रत इंडियन एअरलाइन्स के विमान के यात्रियों के बदले छोड़ दिये जाने की कीमत हम आज तक चुका रहे हैं ?

एक तरफ सीमा पर आज रोज हमारा कोई न कोई सैनिक देश की सुरक्षा की खातिर शहीद हो रहा है दूसरी तरफ आतंकवादी हमारी पुलिस को ललकार रहे हैं । आतंकवादी हर हाल में आतंकवादी ही होता है उसका मानवता से कोई संबंध नहीं होता। कब तक हम मानवता का खून करने वालों के मानव अधिकारों की बात करते रहेंगे ? कब तक हम अपने शहीद जवानों की शहादत की इज्जत करने के बजाय उस पर सवाल उठाते रहेंगे  ? देश की सुरक्षा के लिए जो भी खतरा हों उन पर होने वाली कार्यवाही के समर्थन के बजाय उस पर प्रश्न चिन्ह लगाते रहेंगे  ?

हाँ इस घटना से प्रश्न तो बहुत उठ रहे हैं , वे उठने भी चाहिए और उनके उत्तर मिलने भी चाहिए

प्रश्न यह कि प्रदेश की सबसे बड़ी जेल से इतने खतरनाक आपराधी भागने में सफल कैसे हुए ? क्या हमारी सुरक्षा इतनी कमजोर है कि आठ अपराधी इसे आसानी से न सिर्फ भेद देते हैं बल्कि एक पुलिस वाले की हत्या करके बड़ी आसानी से भाग भी जाते हैं ?

संकेत स्पष्ट है अगर वे इन घटनाओं को अंजाम देकर भागने में सफल हुए हैं तो इसमें उनकी बहादुरी नहीं कुटिलता हैं और हमारी कमी सिर्फ़ सुरक्षा में चूक ही नहीं बल्कि प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही भी है। क्यों सी सी टीवी कैमरों के बावजूद उनके जेल से भागने के प्रयास जेल अधिकारियों को नजर नहीं आए? वे तालों की चाबी बनाने में कामयाब कैसे हुए ? एक साथ 35 चादरें कैसे मिल गईं  ? जब पहले से ही खुफिया एजेंसियों ने इस प्रकार की घटना की आशंका जाहिर करी थी तो उसे सीरियसली क्यों नहीं लिया गया ?

जेल में कैदियों की क्षमता से अधिक संख्या अव्यवस्था को जन्म देती है जिस कारण जेल के भीतर ही कैदियों का एक दूसरे से संघर्ष या फिर जेल के गार्डों पर हमला कर देने की घटनाएं होती रहती हैं। यह भी सत्य है कि कैदियों को जेल के भीतर ही मोबाइल, नशीले पदार्थ व अन्य "सुविधाएं" जेल अधिकारियों की सहायता के बिना उपलब्ध नहीं हो सकती। लेकिन ये कैदी आम नहीं थे क्योंकि यह सभी एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन से ताल्लुक रखते थे और इनमें से तीन इससे पहले भी जेल से फरार हो चुके थे, इन सब के बावजूद इनका फिर जेल से भागने में सफल होना जेल प्रशासन की लापरवाही दर्शाता है जिसे उन्होंने त्वरित कार्यवाही करते हुए आठ घंटे में अपनी भूल सुधार कर काफी हद तक अपनी भूल सुधार ली है।

सरकार ने सुरक्षा में चूक के चलते जेल के चार कर्मचारियों को हटा दिया  है जिनमें जेल अधीक्षक और एडीजी शामिल हैं लेकिन बात यहाँ खत्म नहीं होती।

अभी हाल ही में सपा सासंद मुन्नवर सलीम  का पी.फरहद जासूसी करते हुए पकड़ा गया है। तो त्वरित कार्यवाही तो ठीक है लेकिन इस प्रकार के हमारे बीच के   उन लोगों की असली पहचान और उन पर कार्यवाही अधिक आवश्यक है जो आस्तीनों में छिपे हुए हैं और कुछ पैसों के लालच में देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं ताकि इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

Bihar Chief Minister came up with the complete ban of alcohol whether consumed, sold, or stored in April 2016. Also violators would be imprisoned for 5-10 years. This decision enraged many thinkers across the country as a lot many found it to be atrocious and display of muscle power by Nitish Kumar.

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Much have been said and written about the state of education in Bihar describing the causes and effects elucidating shambolic state of its education system.

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Recently, Chief Justice of India (CJI) Mr T. S. Thakur showed his emotions in public and exhorted and beseeched upon the executive head of the country Mr. Narendra Modi, the Prime Minister, to get filled the vacancy of twenty-two thousand judges as recommended by the Law Commission in 1987.

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