जब मैं ने नेकटाई बाँधी

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कितना अलबेला नाम है ‘नेकटाई । एक पेंच दायीं ओर और दूसरा बायीं ओर। एक ऊपर से और फिर यों । लीजिए, नेकटाई की गाँठ तैयार हो गयी । शीशे में मुंह देखिए, गले का नक्शा एकदम बदला हुआ पायेंगे। गले के हुस्न में जिस टेंदुए ने बदमजगी पैदा कर रखी थी, वही गला एक कुशल माली के साधे हाथों द्वारा गुलदस्ते की तरह अब शोभायमान होने लगा है।

सच भी यही है कि जब तक व्यक्ति टाई बाँधे होता है तब तक उस में कुछ अन्तर रहता है। उसे अपना व्यक्तित्व, अपने आस-पास का सारा संसार आदि सुन्दर और लुभावना लगने लगता है। जेब में एक फूटी कौड़ी भी न हो पर यह लटकती झूल उस पर भी परदा डाल देती है। देखने वाले समझते हैं, कोई पैसेवाला होगा । मगर टाईधारी का ही दिल जानता है कि उस वक्त उस पर क्या गुजरती है जब पान खाने या खिलाने को उस की जेब से दस पैसे भी नहीं निकलते, या फिर किसी खोमचेवाले से अनजाने में टकराने पर चुकता करने के प्रश्न को लेकर उस के इर्द-गिर्द अच्छी-खासी भीड़ जमा हो जाती है और हजरत को चेहरे पर बेचारगी के भाव लिये बगलें झाँकनी पड़ती हैं।

मेरी भी एक दिन इच्छा हुई कि टाई बाँध लू । बाँधी, मगर एक दिन के लिए। एक दिन के लिए क्यों ? आप सुनेंगे तो मुझ पर हँस देंगे। दरअसल, यह क़िस्सा ही कुछ ऐसा है। खैर, आप के सामने अपना दिल खोलकर रख देने में मुझे कोई ऐब नहीं दिखता। 

लीजिए, सुनिए: दफ्तर में उस दिन बैठे-बिठाये विचार जागा, मैं टाई क्यों नहीं बाँधता ? जब मेरे वे मित्र जो मुझ से कम तनख्वाह पाते हैं, टाई बाँधते हैं तो मेरा ही गला खाली क्यों ? विचार काफ़ी अन्दर से जागा था और मैं ने अन्दर ही अन्दर फ़ैसला किया कि अब मैं भी आइन्दा से टाई बाँधकर दफ़्तर आया करूंगा । दूसरे दिन सुबह मैं ने धोबी के यहाँ से आये कपड़ों में से एक कमीज छाँट ली और उसे पहन लिया। फिर नेकटाई बाँधी और ड्राइ-क्लीन करवाया सूट ऊपर से डाटकर चल दिया दफ़्तर की ओर। रास्ते-भर हया-ओ-शर्म से रह-रहकर चलता रहा, क्योंकि जो भी कोई जान-पहचान का मिल जाता वही पहले मेरी टाई की ओर देखता और फिर एक झूठी-सी मुसकान होठों पर बिखेरकर कहने लगता, 'अच्छा, ठीक ! बहुत ठीक!!’

मैं मन ही मन सोचने लगता, क्या सचमुच में मैं ने यह ठीक किया है या ये लोग यों ही कह रहे हैं। तभी दूसरे क्षण उन दोस्तों की याद आती जो मुझ से कम तनख्वाह पाते, मगर फिर भी शान से रंगबिरंगी टाइयाँ बाँधे दफ़्तर आते। इस बात से मेरा कुछ धीरज बँधा और मैं पूरे दम-खम के साथ इधर-उधर नजरें दौड़ाता हुआ आगे बढ़ने लगा। तहदार जुल्फ़ों में गजब की कंघी की हुई थी, पतलून की क्रीज़ एकदम कड़क और बूट पॉलिश से चमचमा रहा था। बड़े मजे से चला जा रहा था मैं । जब बड़ियार के मोड़ पर पहुँचा तो यहाँ मेरी नजरें सड़क के दायें छोर की नाली से जा टकरायीं। दिल बल्लियों उछल पड़ा । नाली के पास दो रुपये का नोट पड़ा हुआ था। हाय री तृष्णा ! नोट की शक्ल देखते ही मेरे दिलोदिमाग पर गजब की बेचैनी हावी हो गयी । जो टाँगें अब तक मौज में चल रही थीं उन में कुदरती ब्रेक-सा लग गया। गरदन को दायें-बायें घुमाया तो हरएक को अपने-अपने काम में मशगूल पाया। सोचने लगा, नोट को उठाना ठीक रहेगा या नहीं। जब किसी की इस पर नजर ही नहीं है तो फिर इसे उठाने में हर्ज ही क्या है?

उस समय नोट उठा सकने का सुभीता न देखकर मैं दो-चार कदम आगे बढ़ गया और फिर दोबारा पीछे मुड़ आया। इस बीच यह खयाल बार-बार आता रहा कि टाई पहने हैं, नोट को उठाना ठीक रहेगा या नहीं। एक बार फिर नोट के ऊपर नजरें जमायीं। लगा, कातर दृष्टि से मेरी ही ओर देखकर कह रहा हो, मैं तुम्हारे ही इंतजार में था, मुझे उठाते क्यों नहीं हो ?" जेब से मुड़ा एक कागज निकालकर नोट के पास मैं ने गिरा दिया। इधर-उधर देखकर नोट तक हाथ को पहुँचाने का उपक्रम करने लगा । दिल गज-गज भर उछल रहा था। सिर से पाँव तक पूरा शरीर ठण्डा पड़ गया। टाँगें काँपने लगीं और माथे पर पसीना छूट आया।

मेरा नोट को छूना ही था कि चारों ओर से हँसी के फ़ौव्वारे उबल पड़े। मुड़कर देखा, सारे दूकानवाले छोटे-छोटे बच्चों के संग मारे हँसी के दुहरे हुए जा रहे थे। मेरा क्या हाल हुआ, मत पूछिए। आंखों के सामने अँधेरा छा गया, दिन में ही तारे नजर आने लगे। हाथ-पाँव ऐंठ-से गये। चेहरे पर जैसे मनो हलदी पुत गयी। कानों ने आगे सुनने से इनकार कर दिया । नोट को उँगलियों में थामे हुए उसी स्थान पर जड़-सा गया। सोचा-या इलाही, यह कौन-सी गैबी बला आन पड़ी।

इतने में उन लोगों में से एक दूकानदार, जो शायद मुझे जानता था, मेरे पास आकर खड़ा हो गया और हँसते हुए कहने लगा, 'माफ़ करना, साहब, आप को तकलीफ़ हुई। इन बच्चों को भी जाने कौन-कौन से मजाक सूझते हैं।" यह कहकर उस ने मेरी उँगलियों में से उस दो रुपये के नोट को बड़ी बेमुरव्वती के साथ झटक लिया । मैं गाय की तरह उस के मुंह की ओर देखता रह गया। मारे हँसी के वे लोग अब भी दुहरे हुए जा रहे थे। मुझे दयनीय अवस्था में देखकर वह दूकानदार फिर बोला, ‘हम सचमुच बहुत शर्मिन्दा है। हम ने सोचा भी न था कि आप जैसे सूटेड-बूटेड जेण्टलमैन की निगाह नाली के इस किनारे तक भी जा सकती है! सॉरी, वेरी सॉरी।"

मैं जैसे गहरी नींद से जाग पड़ा - 'कोई बात नहीं, कोई बात नहीं," घबरायी आवाज में मैं केवल इतना ही कह सका। और जब मैं वहाँ से खिसकने को हुआ तो एक बार फिर ठहाके गूंजे, सीटियाँ बजीं। रीठे-सरीखे दो छोकरे चिल्ला-चिल्लाकर आवाजें कसने लगे, "जेण्टलमैन हाय-हाय ! जेण्टलमैन हायहाय ! नेकटाई और सूट हाय-हाय ! नेकटाई और..."

मैं ने खुद को खूब कोसा । अच्छा-भला चला जा रहा था, इन दो रुपयों को देख जाने क्यों लालच में लपक पड़ा। जितनी भी गालियाँ मुझे याद थीं, उन में से कुछ खुद को दीं और कुछ उन लोगों को जिन्होंने मेरी यह गत बनायी थी। खुद के साथ मैं इस कदर उलझ गया कि मुझे लगने लगा कि राह चलते लोग मेरी ओर ही देखते जा रहे हैं।

मुझे जाना था गावकदल से बायीं ओर और मैं सीधा लाल-चौक पहुँच गया। यहाँ पहुँचकर राहत की एक साँस ली। खड़े-खड़े शरबत के दो गिलास गटक लिये मगर फिर भी अन्दर की लपट शान्त न हुई। खैर, जैसे-तैसे दफ़्तर पहुँच गया। 'हाँ-हाँ, आज हम से कहाँ बोलोगे !" एक मित्र ने भिड़ते ही चुटकी ली। 'बाय गॉड, इस टाई में तो आज हीरो लग रहे हो !" यह बात दूसरे ने कही। मैं खामोश हो कभी एक की ओर देखता तो कभी दूसरे की ओर। 'अरे भाई, कुछ बोलो भी तो, हम नाखुश थोड़े ही हुए हैं। गाज गिरे जलनेवालों पर,” पहलेवाले ने मुझे मूड में लाने की गरज से कहा। ‘लो यार, अब ज्यादा बातें ही क्या करनी हैं,” दूसरे ने बीच में ही बात काटी, 'देख नहीं रहे - नयी टाई, नयी अदा; नया रूप, नयी फ़िजा । इस सब के लिए फॉरमैलिटी अब कैण्टीन में ही पूरी होगी। चलो जल्दी, बड़े साहब आने वाले होंगे ।

मैं सुलग रहा था अन्दर ही अन्दर। मेरी रुखाई की ओर ध्यान न देकर वे मेरा हाथ पकड़कर मुझे कैण्टीन तक ले जाने में जैसे-तैसे सफल हो गये । जो भी इन की इच्छा हुई, हँसते-बतियाते खा-पी गये। मैं भला क्या खाता! मेरे हलक़ के नीचे जैसे किसी ने जोर से गाँठ बाँध दी थी। एक-एक घूंट चाय का लेता तो बड़ियार का एक-एक दृश्य आंखों के सामने सजीव हो उठता।

सारा दिन दफ़्तर में बेचैनी से गुजरा। गरम तवे पर रखी माँछ की तरह तड़फता रहा । पाँच बजते ही जब सभी अपने-अपने घरों की ओर चल दिये तो मुझे खयाल आया कि बड़ियार के उस मोड़ पर यदि सुबह के उन लोगों में से किसी से सामना हुआ तो मेरी क्या हालत होगी ! क्यों न दो-तीन घण्टे अमीराकदल की तरफ़ बिता आऊँ। तब तक अँधेरा भी हो जायेगा और फिर बेखटके घर चला जाऊँगा। पर, निरुद्देश्य डोलने से तो अच्छा यही है कि अँगरेजी फ़िल्म देख ली जाये। हाँ, आइडिया बुरा नहीं है। मजे में फ़िल्म देख लेंगे और तब तक अंधेरा भी खूब घिर आयेगा, फिर घर।

शो शुरू होने के टाइम तक मैं ने लाल चौक के दो राउण्ड लगा लिये । ठीक पौने सात बजे सिनेमा-हॉल की घण्टी वजी। टिकट-घर की खिड़की खुली। मैं ने आश्वस्त होकर अन्दर की जेब में हाथ डाला-‘बाप रे !" मेरे मुंह से हलकी-सी चीख निकल पड़ी। हाथ जेब में ही रह गया। मेरी चीख हवा में घुल चुकी थी। दायें-बायें देखा, शुक्र है जो किसी ने मेरी आवाज सुनी नहीं थी। सभी टिकटें लेने में लगे हुए थे। जेब से हाथ निकाला और बन्द मुट्ठी खोली-बस, दो चवनियाँ। सुबह घर से तो पाँच रुपये का नोट लेकर चला था। साढ़े चार कहाँ गये?ओह! ध्यान आया, मैं भी कैसा भुलक्कड़ हूँ। सुबह शरबत के जो दो गिलास पी डाले थे उस के पैसे दूकानदार लेता नहीं क्या ? एक रुपया उस का और साढ़े तीन रुपये कण्टीनवाला खसोट गया ।

इतने में सिनेमा-हॉल की तीसरी घण्टी भी बज उठी । दरवाजों पर काले परदे तान दिये गये और फ़िल्म चालू हो गयी। क्यों न अठन्नी-क्लास की ही एक टिकट खरीदी जाये, इस रश में मुझे देखेगा भी कौन ? तभी खयाल आया, मगर जो लोग मुझे अठन्नीवाले क्लास में टाई बाँधे देखेंगे, वे भला क्या सोचेंगे। नहीं-नहीं, यह तो जान-बूझकर अपनी इन्सल्ट करवानी हुई। हाँ, एक तरीक़ा है। क्यों न इस टाई को खोलकर जेब के हवाले कर दिया जाये। फिर कोई बात नहीं, अठन्नीवाला क्लास हो या अपर क्लास, कोई कुछ नहीं कह सकता। नजर बचाकर मैं सिनेमा-हॉल के पीछे की ओर गया । जल्दी से टाई खोल दी और उसे पैण्ट की जेब में डाल दिया। टिकट ले लेने के बाद हॉल में प्रवेश किया। यहाँ भी मेरे साथ मजाक हुआ । गेट-कीपर ने बताया कि इस क्लास में एक भी सीट खाली नहीं है, बैठना हो तो इन सीढ़ियों पर बैठ जाओ वरना अपर की टिकट ले आओ।

बचपन में कई बार अठन्नीवाले क्लास में फ़िल्म देखने का मौक़ा मिला था मगर एक किनारे पर सीढ़ियों पर बैठकर फ़िल्म देखने का यह मेरे लिए पहला मौक़ा था । स्क्रीन पर नजरें जमायीं । यह क्या ? आदमियों की खोपड़ियाँ खरबूजों जैसी ! कहीं मेरी आंखों की रोशनी में कुछ फ़र्क तो नहीं आया है? दो-तीन बार पलकें झपकायीं। इस बार कुछ और ही नक्शा दिखा-भागती मोटर मुझे लम्बी बस जैसी दिखाई देती, पेड़ हेडलांग किये हुए नजर आते । खुद पर हँसी भी आ रही थी और रोना भी। ख़ैर, जैसे-तैसे मैं ने अपने दो सवा-दो घण्टे बिता ही दिये। शो समाप्त हुआ और एक ही छलांग में तीनों सीढ़ियाँ पार कर के मैं ने बाहर आकर दम लिया । जेब में हाथ डाला, टाई नदारद। जेबों में टाई तलाश ही रहा था कि दो-तीन मित्र इकट्ठे हो गये। ये लोग फ़िल्म के बारे में बहस करने लगे। एक कहने लगा, अच्छी थी; तो दूसरा बोला, साधारण ही थी। मैं यों ही 'हाँ-हूँ' करता रहा। अन्दर ही अन्दर मैं बहुत परेशान हो रहा था, पर कहता किस से ? तभी पीछे से कुछ आवाजें मेरे कानों में पड़ीं। मैं ने पलटकर देखा, ठिगने क़द का एक व्यक्ति अपने साथी से कह रहा था, 'यार, कुछ और मिला होता। यह साली टाई हमारे क्या काम आयेगी ? लगता है, आज कोई दलिद्दर टाई बाँधकर फ़िल्म देखने आया था। खैर, कोई बात नहीं। हम ने भी घर पर एक विलायती पिल्ला पाल रखा है, उस के पट्टे के काम आयेगी।"

यह कहते हुए वे दोनों साइकिल पर सवार हो डल-गेट की ओर चल दिये। मैं उन्हें तब तक देखता रहा जब तक कि वे मेरी दृष्टि से ओझल न हुए।


Som Nath Sadhu, a Kashmiri writer, is known for his best literary flair more especially in the area of satire. He retired as Director Gen. External Services All India Radio nearly three decades back. This article, Sadhus's one of the best, has been rendered into Hindi by PatnaDaily guest contributor Shiben Krishen Raina.

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