लव जिहाद या हिंदुत्व की राजनीति ?

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भारत जब ब्रिटिश शासन की गुलामी की जंजीरो में जकड़ रहा था और जब गुलामी की जंजीरों से आज़ाद हो रहा था, ये दोनों ऐसे समय थे जो हमें कुछ सीख दे रहे थे. जब हमारा देश गुलाम बना उस वक़्त हम बटे हुए थे. उस वक़्त के राजशाही में शासन विकेन्द्रित हो चुकी थी. सारे सूबे लगभग स्वायत्त हो चुके थे. ऐसे में अंग्रेज आए और धीरे-धीरे सब जगह अपनी ताकत फैलाते गए और अंततः अपनी हुकूमत कायम की.

और भी बहुत से कारण है जिसकी वजह से भारत की ये दुर्दशा हुई. उस वक़्त हिंदुस्तान में धार्मिक और जातीय भावनाएं बड़े स्तर पर  फैली हुई थी. भारत के लोग दूसरी जगह से नावाकिफ थे. उस समय यहाँ के स्थानीय लोग समुद्र की सफर नहीं करते थे, उस वक़्त समुद्र में सफर करना पाप और धर्म के खिलाफ माना जाता था. पश्चिम देश विज्ञान और तकनीक में काफी आगे बढ़ चुके थे जो उनकी जीत में बहुत ही कारगर साबित हुई.

देश आज़ादी के नजदीक पहुँचा वो हमारी एकता का प्रतीक और नतीजा था. गुलामी के वक़्त हमें ये समझ आया की वो मजबूत है क्योंकि वो एक है. हम भी एक हुए और देश को आज़ाद कराया. अपनी पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए तत्कालीन समाज ने ये जरुरत महसूस किया की हमारा एक होना ही हमें सफलता तक पहुँचायेगी. आज़ादी के बाद इसके लिए कई सारे कदम उठाये गए. वर्ण व्यवस्थता खत्म करने और मानवीय अंतर को पाटने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई. उस वक़्त के बुद्धिजीवी वर्ग को ये लगा की सारी मुसीबतों की जड़ वर्ण व्यवस्था ही है इसलिए तब से अब तक उसको खत्म करने के लिए लगातार प्रयास होता रहा है.

इस अंतर को खत्म करने,  सामाजिक एकता को फलने फूलने और देश के विकास के लिए लोगों ने अंतर-जातीय शादियों को बढ़ावा दिया. नेहरू के समय में कई नेताओं का ये मानना था की सरकारी विभाग और राजनीतिक लोगों के लिए अंतर-जातीय शादी अनिवार्य रूप से लागु कर दिया जाये. लेकिन ये एक अच्छा सुझाव होते हुए भी लागु नही हो सकता था क्यों की इससे निजता और स्वतंत्रता का उल्लंघन होता.

आज के समय भारत में अंतर-जातीय शादी के बढ़ावा के लिए प्रोत्साहन राशि दिया जाता है. इस तरीके का प्रावधान चीन के भी कुछ इलाकों में चल रहे है.

मौजूदा हालत में भारत का माहौल कुछ धार्मिक संगठन और नेता बिगाड़ रहे है. कहाँ हम एक होने के रास्ते पे चल रहे है और वो लोगों को बाटने में लगे हुए है. उनका कहना है की भारत में 'लव जिहाद' चला हुआ है. उनके अनुसार मुस्लिम लड़के हिन्दू लड़कियों से शादी कर उनका जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करा रहे है. मैंने तो ऐसा कभी नहीं देखा! और मुझे उम्मीद है की अधिकतर लोगों ने ऐसा नहीं देखा होगा. ऐसी चीज़ें बस इन्हीं लोगों को दिखती है क्योंकि इन्हें लोगों को बाटना जो है. अपवाद हो सकते है और इसकी सम्भावना तो हर जगह होती है. लेकिन उनके सोच के ठीक विपरीत भी तो घटनाये हो सकती है मसलन हिन्दू लड़के मुस्लिम लड़की से शादी कर उसका धर्म परिवर्तन करते हो? हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं हो रहा. बस लोगों को बाटने का काम कर रहे  है ये संकीर्ण सोच के लोग.

सामान्यतः इस मुल्क में लव मैरेज के बाद महिलाएं पुरुष के धर्म के अनुसार अपना धर्म परिवर्तन कर लेती है क्यों की हमारा मुल्क अभी भी पुरुष प्रधान देश है, महिलाएं स्वतंत्र नहीं हो सकी है.. लेकिन ऐसा सिर्फ एक ही पक्ष के लिए होता हो ये मेरी समझ से बाहर है! ऐसी बातों का मुद्दा बनाया जाना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसी सोच हमें एक बार फिर अँधेरे के तरफ धकेल सकती है.

हमें सोचने की जरूरत है कि अगर जहीर खान सागरिका घाटगे ले आए हैं तो दूसरी तरफ अजीत अगरकर का आंगन भी फातिमा से रोशन है. अगर मुख्तार नकवी ने प्रेम विवाह किया है तो सचिन पायलट भी सारा के दीवाने हुए हैं. अगर आमिर खान किरण के साथ अपना पेशा चमकाएं हुए हैं तो मान्यता (दिलनशीन शेख) ने भी संजय दत्त के जेल से निकलने का इंतजार किया है.

मगर यह बड़े नाम हैं. ये लोग तो खुशहाल है. बस गरीब का प्यार ही 'लव जिहाद' नाम के फ़न्दे पर लटकने लगा है. इन्हें निशाना बनाना आसान है.

ऐसा लगता है भारत में कई धार्मिक संगठनों को खुली छूट मिली हुई है. ये खुले-आम दूसरे समुदाय को चुनौती दे रहे हैं और सरकार तमाशबीन बनी हुई है या यूं कहें कि सरकार का उन्हें अप्रत्यक्ष रुप से समर्थन प्राप्त है ताकि उन्हें अपनी राजनीति चमकाने का मौका मिलता रहे.

हम सभी को समझने की जरूरत है कि हम कैसा माहौल तैयार कर रहे हैं. अपनी अगली पीढ़ी को हम कैसा भारत सौंपने जा रहे हैं. हमें सोचने की जरूरत है कि ऐसे कारनामों से भारत में आतंकवाद की जड़ें क्या और मजबूत नहीं होगी ? क्या हम पाकिस्तान और अफगानिस्तान का पर्याय बनना चाहते हैं ? क्या हम भारत जैसे देश में एक नई तरह की आतंकी मानसिकता पैदा कर रहे हैं जो कभी शंभूलाल के रूप में दिखाई दे रहा है तो कभी अख्लाक के दर्द की गुंज के रूप में सुनाई पड़ रहा ? क्या हम इस्लामिक चरमपंथ की तरह ही भगवा चरमपंथ की तरफ अग्रसर है ? क्या हम पाकिस्तान की तरह का विकास मॉडल चाहते हैं जो कभी अमेरिका के टुकड़ों पर पलता है तो कभी चाइना के उपकार के भरोसे रहता है ?

हमारे भारत में ऐसी नफ़रतें तो न थी पहले. हम धर्मनिरपेक्ष लोगों को ऐसी घड़ी में आवाज बुलंद करने की जरूरत है. अनेकता में एकता का विश्वास कहीं हमेशा के लिए बुझ ना जाए इसलिए हमें अब मशाल बनने की जरूरत है. कहीं देर ना हो जाए.


Md. Mustaqueem
M A in Communication
Doon University, Dehradun

The writer, a native of Gopalganj in Bihar, has worked as a special correspondent to the Indian Plan magazine in Uttrakhand and is currently working as a teacher in a government middle school in Siwan district of Bihar.

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