प्रसिद्ध कूट-नीतिज्ञ चाणक्य का कथन है कि राजा का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह अपने राज्य में प्रजा के जीवन और सम्पत्ति की रक्षा करे। राजा से यह भी अपेक्षा की जाती है कि तमाम सामाजिक संकटों में अपनी प्रजा की वह रक्षा करे। यही नहीं राजा को अपनी प्रजा की अकाल, बाढ़, महामारी आदि में समुचित रक्षा-व्यवस्था करनी चाहिए।

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शाहीन बाग़ में जुड़े मजमे को संबोधित करने के लिए विभिन्न पार्टियों के नेताओं में होड़ मची हुयी है। कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर, दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद आदि इस मौके को हाथ से न जाने देने की गरज से भीड़ को उलटी-सीधी पट्टी पढ़ा चुके हैं और पढ़ा भी रहे हैं।

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डाक्टर कुमार विमल बिहार के ही नहीं समूचे हिंदी जगत के एक जाने-माने कवि, लेखक और चिन्तक थे। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक, तत्पश्चात बिहार लोकसेवा आयोग के सदस्य और बाद में इसी आयोग के अध्यक्ष बने।

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मीडिया-कर्म के दायित्व पर बहुत कुछ लिखा या समझाया जाता रहा है। उसका निष्पक्ष रहना या फिर किसी विचार या पक्ष पर अपना अलग से स्टैंड (stand) लेना, इस पर भी बहुत बहस हो चुकी है।

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पिछले दिनों ईयू/योरोपियन यूनियन का एक शिष्ट-मंडल जम्मू-कश्मीर के ताजा हालात का जायज़ा लेने के लिए घाटी के दौरे पर गया था। पत्रकारों को संबोधित करते हुए शिष्ट-मंडल ने स्पष्ट शब्दों में यह रेखांकित किया है कि आर्टिकल 370 को हटाया जाना भारत देश का अपना अंदूरूनी मामला है। घाटी में हो रही आतंकी घटनाओं की सभी सदस्यों ने एकस्वर में भर्त्सना की है और अभी हाल ही में पश्चिमी बंगाल के पांच मज़दूरों की आतंकियों द्वारा की गई जघन्य हत्याओं की कड़े शब्दों में निंदा भी की है।

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मालदीव से बिटिया का फोन आया कि लगभग दस दिनों के लिए हम अलवर आ रहे हैं। प्रशांत ने जयपुर के निकट मनोहरपुर/बिशनगढ़ में बने अति चर्चित और भव्य "अलीला" रिसोर्ट में दो नाइट्स की एडवांस बुकिंग भी की है। आप दोनों के लिए अलग से कमरा भी बुक करा दिया है। ना मत करना।

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प्रायः अनुभव किया गया है कि हमारे देश की कई सारी सामाजिक संस्थाओं के नाम ख़ास तौर पर होस्टलों के नाम जातियों पर रखे गये मिलेंगे। मसलन जाट होस्टल, राजपूत होस्टल, ब्राह्मण छात्रावास, मीणा छात्रावास, यादव होस्टल आदि-आदि ।

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चौंसठ कश्मीरी पंडितों ने अनुच्छेद 370 हटाये जाने के विरोध में एक वक्तव्य जारी किया है। ये वही लोग हैं जो हर-हमेशा लाभ के पदों पर रहे हैं और पण्डितों के विस्थापन का दंश जिन्होंने कभी झेला नहीं।

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पांच अगस्त २०१९ का दिन भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण-अक्षरों में लिखा जायगा। जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देने वाली संविधान की धारा ३७० को हटाने के प्रस्ताव को राज्य-सभा ने अपनी मंजूरी दे दी। सचमुच, यह एक ऐतिहासिक फैसला है जिस पर कई दिनों से कई तरह की अटकलें लग रही थीं।

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30 जुलाई 2019 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। तीन तलाक विधेयक को राज्य सभा ने अपनी मंजूरी दे दी। लोक सभा से इस बिल को पहले ही मंजूरी मिल गयी थी। सचमुच, महिला सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया यह एक अभूतपूर्व कदम है! तुष्टीकरण के चलते जो न्याय पिछली सरकारें शाहबानो को नहीं दे पायीं थी, वह चिरप्रतीक्षित न्याय वर्तमान सरकार ने शाहबानो के हवाले से मुस्लिम महिलाओं को लगभग 34 वर्ष बाद दिला दिया।

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किसी ज़माने में संपादक की ओर से लेखक के लिए यह फौरी हिदायत होती थी कि भेजी गई रचना मौलिक, अप्रकाशित हो और अन्यत्र भी न भेजी गई हो। पता लिखा/टिकट लगा लिफाफा रचना के साथ संलग्न करना आवश्यक होता था अन्यथा अस्वीकृति की स्थिति में रचना लौटाई नहीं जा सकती थी। रचना के प्रकाशन के बारे में लगभग तीन माह तक जानकारी हासिल करना भी वर्जित था।रचना छपती तो मन बल्लियों उछलता और अगर लौट आती तो उदासी और तल्खी कई दिनों तक छाई रहती।

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मोब-लिन्चिंग की, छेड़खानियों की, झगड़े फसाद की, मार-कुटाई की, हत्याओं आदि की घटनाएँ बढ़ रही हैं और इनकी वीडियो-क्लिप्स हमें आये दिन टीवी चैनलों पर या अन्यत्र देखने को मिलती हैं।

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