कश्मीर की आदि सन्त कवयित्री योगिनी ललद्यद (१४वीं शती) निःसन्देह संसार की महानतम आध्यात्मिक विभूतियों में से एक थीं, जिसने अपने जीवनकाल में ही परमविभु का मार्ग खोज लिया था और ईश्वर के धाम /प्रकाशस्थान में प्रवेश कर लिया था। वह जीवनमुक्त थी तथा उसके लिए जीवन अपनी सार्थकता एवं मृत्यु अपनी भयंकरता खो चुके थे । उसने ईश्वर से एकनिष्ठ होकर प्रेम किया था और उसे अपने में स्थित पाया था (खुछुम पंडित पननि गरे)।

Culture has rightly been defined as the adaptation of ways of living built up by a group of human beings over the years and transmitted from one generation to another. Needless to mention that the social, cultural, and natural environment of local speakers influence the structures and development of the language of those speakers who by compulsion or due to some other reasons have shifted to some other lingual regions. The displacement, in addition to creating certain vital cultural glitches and obscurities, adversely affects the language that the ‘diaspora’ originally possessed.

South Indian female actresses who successfully paved their way into the Hindi cinema, i.e., Bollywood are no less in number. All these actresses have very convincingly succeeded in blurring the linguistic and topographic boundaries in Indian cinema. To name a few: Padmini, Vyjayantimala, Hema Malini, Rekha, Jayaprada etc. are still fresh in our memory. Sri Devi, too, was one amongst these gifted and talented artists.

कश्मीर शैवदर्शन की जब चर्चा चलती है तो स्वछन्द-भैरव द्वारा प्रस्फुटित “बहुरूपगर्भ स्तोत्र” की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए इन स्तोत्रों/श्लोकों का पठन-पाठन बड़ा ही फलदायी और सार्थक माना जाता है।

कहावत मानव-जीवन के अनुभवों की मार्मिक, सूत्रात्मक और सहज अभिव्यक्ति है। यह एक सजीव और चुभता हुआ व्यावहारिक अनुभव-सूत्र है जो जनमानस की देन और धरोहर है। वे सभी घटनाएं, जो मनुष्य के हृदय को आलोड़ित कर उसके स्मृति-पटल पर स्थायी रूप से अंकित हो जाती हैं, कालांतर में उसकी प्रखर बुद्धि के अवशेषों के रूप में कहावतें बन जाती हैं।

रात के ग्यारह बजे और ऊपर से जाड़ों के दिन। मैं बड़े मजे में रजाई ओढ़े निद्रा-देवी की शरण में चला गया था। अचानक मुझे लगा कि कोई मेरी रज़ाई खींचकर मुझे जगाने की चेष्टा कर रहा है। अब आप तो जानते ही हैं कि एक तो मीठी नींद और वह भी तीन किलो वज़नी रजाई की गरमाहट में सिकी नींद, कितनी प्यारी, कितनी दिलकश और मज़ेदार होती है।

माना जाता है कि कश्मीर घाटी से पंडितों का विस्थापन सात बार हुआ है। पहला विस्थापन १३८९ ई० के आसपास हुआ जब घाटी में विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा बलपूर्वक इस्लामीकरण के परिणामस्वरूप हजारों की संख्या में पंडित या तो हताहत हुए या फिर अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए। इस बीच अलग-अलग कालावधियों में पाँच बार और पंडितों का घाटी से निष्कासन हुआ। सातवीं और आखिरी बार पंडितों का विस्थापन १९९० में हुआ।

पिछले दिनों राहुल गाँधी ने खाड़ी देश बहरीन की यात्रा की । कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान बहरीन में राहुल गांधी ने वहां एक कार्यक्रम में भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते हुए अपने देश की वर्तमान सरकार की खासी बुराई की। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार गरीबी हटाने, रोजगार देने और शिक्षा-व्यवस्था में सुधार लाने के बजाय नफरत फैलाने और समाज को जातियों में बांटने का काम कर रही है।

सियासी पार्टियों को व्यक्ति कहने को तो जनता जनार्दन की सेवा करने, ज़ंग-खाई व्यवस्था में बदलाव लाने या फिर देश/समाज का चहुमुखी विकास करने आदि की गर्ज़ से जॉइन करता है।