हम देख रहें हैं कि आजकल लोगों में इतिहास के प्रति रुझानबढ़ रहा है। एक हमारा समय था कि लगता था कि इतिहास से सिर्फ हमारा और कुछ गिने चुनेलोगों का ही लगाव है। हमारा लगाव इस कदर था कि ग्यारहवीं का फार्म भरते तक पिताजीने छूट दी थी कि आर्टस लें या साईंस (और इसके लिए हम उनके तहेदिल से शुक्रगुजारहैं)। पर हमने विज्ञान को चुना – सोचा इतिहास तो जो बनना था बन गया अब हमारे इतिहासबनाने का समय है।

हिमाचल के साथ हमारा रिश्ता पुराना है – हमने अपनीइंजीनियरिंग यहीं से की है। प्राचीन इतिहास और अद्भुत सुंदरता को अपने अंदर समेटेयह धरती मानव (तथा देवों) को सदियों से आकृष्ट करते आई है। जाहिर सी बात है किहमारा परिवार भी इस देवभूमि को देखने को इच्छुक था। अभी हाल में ही उनकी यह इच्छापूरी हो गई। हमारे पिता तो एक बार हमारे साथ हिमाचल आए भी थे पर हमारी माँ एवं भाईके लिए यह भूमि नई थी।

सच कहें तो हमें लगता है कि सोशल नेटवर्किंग’ मानव सभ्यताकी अब तक की सबसे क्रांतिकारी ईजाद है। बस कुछ सोचा ही कि वह फुर्र से हमारे जाननेवालों को पता चल जाता है। सोच तो प्रकाश से भी ज्यादा तेज हो सकती है - सोशलनेटवर्क’ उसमें भी बूस्टर लगा रहा है।

हम लिखें इससे पहले ही हम स्पष्ट कर दें कि हम सेकुलर’ यानि कि धर्मनिरपेक्ष हैं।यह स्पष्ट करना निम्नलिखित कारणों से जरूरी हो जाता है: - पहला कि यह सत्य है – हमारा मानना है कि इंसान को उसकी सोच एवं आचरण से बाँटना चाहिए न कि उसके भगवान याजन्म के अनुसार। और दूसरा कि आज के माहौल का कोई ठीक नही है – पता नहीं कि कौनआकर यह आरोप लगा दे कि आपका यह लेख तो भई समाज में सांप्रदायिक अलगाव पैदा करने कीक्षमता रखता है।

हम सिनेमा कला के वर्षो से प्रशंसक रहे हैं। जाहिर सी बातहैं कि इस विषय पर हमारी अपनी राय भी है जिसे हम कभी व्यक्त करते हैं और कभी अपनेतक ही सीमित रखते हैं। रोहित शेट्टी की फिल्मों के बारे में हमारा मानना है किउन्हे गंभीरता से लेने की कोई भी आवश्यक्ता नही है। सिनेमा के शौकिन होने के कारणहम यदा-कदा जब उनकी फिल्में देखने जाते भी हैं तो दिलोदिमाग ताक पर रख कर – पतानहीं कब कोई सीन खुराफात कर हमारे सिनेमाबोध पर बुरा असर छोड़ जाए। 

हम सोच ही रहें थे कि ऐसा अब तक क्यों नहीं हुआ कि बयान आया – ‘नए तेलेंगाना राज्यमें आंध्रा मूल के राज्य कर्मचारियों की जरूरत नहीं हैं।’ तेलेंगाना राज्य समिति केअध्यक्ष का यह बयान मूलत: तेलेंगाना निवासियों के हित में बोला गया – ‘आंध्रा मूल’ के कर्मचारी नहीं रहेंगे तो उनकी जगह तेलेंगाना के लोग लेंगे। बेरोजगारी घटेगी औरतेलेंगाना आंध्रा कोलोनियलिस्म’ से आजाद होगा।

It was a bad day at the office. I left early. As I dragged myself back from work I was taken over by frustration and started cursing myself and my job. It was that feeling of ‘being trapped’ which many of us have felt sometime or other in our career - you know how it makes us feel helpless and miserable. Once in my room, I tossed my things on bed and sat on chair staring blankly at the window. I was in emotional turmoil and not knowing exactly what to do next.

I assume most of you would be well aware of the ‘Mass Bunk Syndrome’ and many of you would have been at least a part of it or something similar at least once in your life. To the uninitiated ‘Mass Bunk’ is a term used for collective action on the decision of not attending a particular session or a class generally by a group of students (but can be done by any group of people).

In the last couple of years I could sense a lot of pessimism in the public perception regarding the state of India mostly fuelled by continuous media coverage on the frequently unearthed ‘scams’/‘misconduct of powerful’ and the widely aired belief of the paralysis of the Central government. A few days back a dejected colleague wondered ‘Will India come out of this pit?’

The ‘Celebrate Humanity’ campaign which was launched in the run up of the 2000 Sydney Olympics remains one of the most effective Olympics campaign. Seven smart creative not only communicate the core values of Olympic Games but also invite the world to celebrate these values. This promotional campaign had touched my life deeply – every time I come across this campaign I feel inspired.

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