“आओ बच्चों आज मैं तुम्हे दूर देश की एक कहानी सुनाता हूँ.”

"बहुत दूर की?"

"हाँ बहुत दूर की, लेकिन लगेगी तुम्हें बड़ी जानी पहचानी सी."

"आपने भी तो किसी से सुनी होगी, अंकल - ज़बानी? या शायद किताबों में रही होगी यह कहानी?"

“बिलकुल यही कहानी तो नहीं लेकिन हाँ इस का प्रेरणा स्रोत है कोई इतालवी। जानोगे नाम उसका? - इटालो कल्वीनो। पर छोड़ो इन बातों को, ये बातें हैं बिलकुल बेमानी. ध्यान से सुनो और मन ही मन इन प्रश्नों का मनन करो - क्या एक अकेला चना भाँड़ फोड़ सकता है ? क्या एक सड़ा सेव पूरी टोकरी के सेवों को सड़ा सकता है? क्या दोनों प्रश्नों के उत्तर हाँ हो सकते हैं ? आराम से बैठो, कोई कोना पकड़ लो, अगर कुर्सी पर हो तब तो कुर्सी मत छोड़ो। पर कोई भी जगह मिले तो कोशिश करके पसर जाओ.”

"एक देश था। उस देश में सभी चोर थे। सब कुछ बड़े सुचारु रूप से चलता था। गाड़ियां चलती थी, नाव चलते थे, बड़े-बड़े जहाज चलते थे। कभी-कभार लात जूते भी चल जाते थे लेकिन अमूमन लोग अपने धंधे में लिप्त मिलजुल कर बड़े सुख और संतोष से रहते थे। रात होते ही सभी हाथ में टॉर्च और बड़ा सा झोला लेकर निकल पड़ते थे अपने काम पर - चोरी करने। हर चोर अपने पडोसी के घर चोरी करता और सबेरे घर आ जाता। अंतिम घर वाला पहले घर वाले के घर चोरी कर लेता था। सरकार जनता के घरों से चोरी कर लेती थी। जनता अपनी बुद्धि एवं हिकमत के अनुसार सरकार से भी चोरी कर लेती थी. मिथ्या आचरण या मूर्ख बनाकर ठग लेना भी व्यापार का अभिन्न अंग था। ठगी, धोखाधड़ी जैसे शब्द उनके शब्दकोष में नहीं थे इसलिए ये सब साधारण व्यवहार ,भ्रष्टाचार और सदाचार में कोई फर्क नहीं था । सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। बहस का कोई मुद्दा नहीं था इसलिए लोगों में बैर भी नहीं था.

"एक दिन उस देश में कहीं से एक आदमी आया, आदमी इसलिए कि वह देखने में बिलकुल आदमी की तरह लगता था: दो हाँथ, दो पैर, दो आँखे। बिलकुल आदमी की तरह. पैर में पतलून, धड़े में कमीज जैसे आम आदमी पहनते हैं.

"अब आगे भी बढ़ो न अंकल, क्या आदमी देख कर हम नहीं पहचान सकते। आदमी की परिभाषा बता रहे हो?"

अरे जाहिलों, मैं तुम्हारी कहानी नहीं कह रहा हूँ न, मैं उस दूर देश की कहानी कह रहा हूँ. लेकिन देश वासियों को जल्दी ही पता चलगया कि वह आदमी बड़ा अजीब है । सबेरे से शाम तक तो वह गायब रहता लेकिन शाम में घर आ जाता और खा पीकर किताबें पढ़ता, संगीत सुनता और जब नींद आ जाती तो सो जाता। अन्य लोगों की तरह वह रात में टॉर्च ओर झोला लेकर काम पर नहीं निकलता. लिहाज़ा अब इस श्रृंखला में उसके घर में रात में चोरी करने का जिसका अधिकार बनता था इस अवसर से वंचित हो गया. जिसने चोरी नहीं की वह समय से पहले घर लौट आता जिससे उसके घर चोरी नहीं हो सकती थी । इसका एक डोमिनो इफ़ेक्ट यह हुआ कि चोरी पर स्थापित व्यवस्था में देश के सारे कार्य कलाप ठप्प हो गये। लोगों ने सोचा नया आया है , सीख जाएगा। लेकिंन जब एक सप्ताह हो गया और बिना किसे के किसी के घर चोरी किये तो देश की अर्थ व्यवस्था डगमगाने लगी।

देशवासियों का एक शिष्ट मंडल उस परदेसी के घर घर पहुंचा और उससे उसके इस विचित्र व्यवहार का कारण पूछा . 'भैय्ये , आप तो बिलकुल हम लोगों की तरह ही दीखते हो , सब कुछ तो वैसा ही है , फिर क्यों हमलोगों के ज़िन्दगी में ज़हर घोल रहे हो। न चोरी करते हो , न चोरी करने देते हो।" उस अजनबी को पहले तो कुछ समझ में नहीं आया क्योंकि विशुद्ध चोरी पर स्थापित इस साम्यवादी व्यवस्था को वह समझ नहीं पा रहा था। पर जब उसे यह बात समझ में आई तो उसने फौरन अपनी रातें बाहर बिताने का वादा किया जिससे देश के लोगों के काम काज में दखल न पड़े । लेकिन उसने स्वयं चोरी करने से साफ़ मना कर दिया क्योंकि वह ईमानदार था . लोग आपस में फुसफुसाने लगे " मैं न कहता था कहीं कुछ गड़बड़ है. " उसने बहुत समझाने की कोशिश की कि ईमानदारी क्या होती है लेकिन जहाँ बेईमानी और धोखाधड़ी शब्द ही न हो वहां ईमानदारी का मतलब समझाना कठिन हो जाता है. बहरहाल, देश की व्यवस्था बहाल करने की गरज से वह अब नियमित रूप से रात में बहार जाने लगा। वह किसी और के घर चोरी करके अपना घर नहीं भर रहा था उत्तरोत्तर उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी और उसपर आश्रित चोर एक दिन बिलकुल खाली हाथ लौटा क्योंकि वह अब निपट निर्धन और विपन्न हो चुका था। परन्तु जिस के घर उसे चोरी करने जाना था उसके पास एक बड़ी पूँजी का मालिक बन बैठा . धीरे-धीरे एक खुशहाल देश जिसकी अर्थव्यवस्था की मिसाल दी जाती थी , लड़खड़ाने लगी. लोगों में श्रम के प्रति जो सम्मान का भाव था वह समाप्त होने लगा , कोई गरीब , कोई अमीर होने लगा. रात में में पूरी निष्ठा और सौहार्द्र के साथ सब काम पर जाते थे और सबकी आय सुनिश्चित थी परन्तु अब अनिश्चितता का माहौल हो गया। राज्य में बेरोज़गारी,काहिलपन तथा घोर असंतोष का माहौल हो गया. सरकारी ख़ज़ाने की स्थिति भी नाज़ुक हो गयी।

सरकार ने फौरन जांच समिति बैठाई। समिति को इस कुव्यवस्था का मूल जाननें में बिलकुल समय नहीं लगा. आम राय बनी कि वही अजनबी इस सब के लिए जिम्मेवार है। समिति के सदस्य जब उसके घर पहुंचे तो वह अंतिम सांसे गिन रहा था। लगातार भूख और कुपोषण से उसके शरीर का ढांचा अस्थि पंजर बनकर रह गया था फिर भी उसने समिति के साथ यथा संभव सहयोग किया। समिति की जांच चल ही रही थी की यह अफ़वाह चल पड़ी कि देश की अर्थव्यस्था चौपट कर अराजकता फैलाकर राजा को अपदस्थ करने की साजिश का भंडाफोड़ हो गया है। लोग धीरे धीरे उसके घर में जुटने लगे। आरोपित का बयान चल रहा था। उस की काया तो सूखकर कांटा हो चुकी थी परन्तु उसकी आवाज़ में एक खनक थी जो इस देशवासियों को कुछ को विचित्र ढंग से उत्प्रेरित, और कुछ को भयाकुल करने लगी। उसकी बात में कुछ ऐसा वजन था कि लोग चोरी से इतर किसी व्यवस्था पर सोचने के लिए विवश होने लगे। बात हवा की तरह फैलने लगी. राजे के कारिंदे और कारकूनों ने उसे फ़ौरन आतंकवादी करार दिया। फायरिंग स्क्वाड ने उसे तत्काल गोली से उड़ा दिया। जनता को सही सन्देश देने की नीयत से जहाँ देश के अन्य महापुरुषों की मूर्ती लगी थी, वहीँ उसकी भी, चेहरा काला कर, एक मूर्ती लगा दी गयी। मीडिया ने देश की जनता को आसन्न खतरे के तहत और सावधानी बरतने की अपील क्योंकि ईमानदार आतंकवादी देखने में आम आदमी की तरह ही लगता था सिर्फ उसके इरादे देश काल के हित में नहीं थे।

पुरानी व्यवस्था फिर से बहाल हो गयी. खस्ताहाल जनता पुनः मालमाल हो गयी। सब कुछ पहले से भी ज्यादा सुचारू रूप से चलने लगे । फटे पुराने नोट, बंद पड़े बिजली के पंखे, सरकारी मिल, हृदयघात से मरीज़ों के लगभग निष्क्रिय हो चुके दिल सब अनायास चलने लगे। कुछ समय तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा। देश में बड़ी बड़ी मूंछों वाले रोबीले महापुरुषों की मूर्तियों पर दक्षता दिवस के दिन माल्यार्पण का चलन था. एक कोने में काला मुँह वाला कृशकाय ईमानदार पुतला भी खड़ा था. कुछ अधिक उत्साही लोग उसे एक-आध जूते भी लगा देते। धीरे धीरे एक नयी पीढ़ी परवान चढ़ी जिसे इस काले मुंह वाले पुतले के बारे में कुछ भी मालूम न था। महापुरुषों के जीवन चरित्र एवं उनकी चोरी चकारी के लोमहर्षक किस्से तो पाठ्य पुस्तकों का हिस्सा थे लेकिन यह काले मुंह वाले पुतला कौन था? एक अत्यंत बूढ़े नागरिक ने उन्हें इस काले पुतले की कहानी सुनाई। अब सब नवयुवकों ने उसे घेर लिया। उनके इस प्रश्न का कि 'क्या चोरी पर आधारित व्यवस्था का कोई विकल्प भी है' उसके पास कोई उत्तर न था. तब तक कुछ अन्य शहरी भी आ गए और उन्होंने उस बूढ़े को तो कस कर डांट लगायी ही युवकों को भी सलाह दी कि फिज़ूल की बातों में पड़ कर अपना समय न बर्बाद करें।

लेकिन खुराफात तो हो चुकी थी. बहुतों को यह बात कुरेदने लगी थी - क्या सचमुच? जो बातें आपस में कहीं कोने , किनारे में होती थी, धीरे-धीरे खुले आम चर्चा की जाने लगी। लोग बहस करने लगे। युवा तो युवा कुछ प्रौढ़, अनुभवी लोग भी ईमानदार, ईमानदारी, सदाचार, भ्रष्टाचार जैसे निषिद्ध, विस्मृत शब्द का प्रयोग करने लगे. ज़िन्दगी फिर से बहाल तो हो गयी लेकिन जो कॉम पहले शुद्ध अंतःकरण से निःशंक होकर करते थे उसे ही करने में अब एक अजीब खटका लगा रहता है। पूरा का पूरा पहाड़, सारा का सारा जंगल, कई पीढ़ियों का भविष्य चुरा लेने वालों दिग्गजों का भी छोटी मोटी चोरियां करने में आत्मविश्वास डगमगाने लगा। अपने आप से डरे हुए लोग काम पर जाते। बहुत लोगों को महसूस होने लगा कि उनके अंदर कोई बैठा हुआ है । इस बीच किसी ने यह अफवाह उड़ा दी कि महापुरुषों की समाधी स्थल से काले पुतले की अट्टहास की भी आवाज़ आती है। सरकार ने उस मूर्ती को विखंडित कर रातो-रात समुद्र में विसर्जित करा दिया। लेकिन बात कुछ बनी नहीं.

आमलोग अब सरकार की शिकायत करने लगे - उस अजनबी को ज़रूरत क्या थी मारने की, चुपचाप रात के अँधेरे में उसे देश से, अपनी ज़िन्दगी से ,अपनी भाषा से निर्वासित कर देते. वह तो अब हमारी भाषा में समा कर हमारे दिमागों में घुसपैठ कर रहा है। ओझा, गुनी वैद्य सब ने हार मान ली लेकिन कही गहरे बैठे हुए उस - वह जो भी था - को निकल नहीं पाए. लोग चोरियां तो अब भी करते थे लेकिन बुझे-बुझे दिल से, बेमन से, ज़ेहनी तौर से हारे हुए. बड़े बूढ़े उस अभागे के आने से पहले के दिनों के किस्से बड़े चाव से सुनाया करते थे। वो भी क्या दिन थे?


India Today magazine once referred to Manoje Nath, a 1973-batch IPS officer, as being fiercely independent, honest, and upright. Besides his numerous official reports on various issues exposing corruption in the bureaucracy in Bihar, Nath is also a writer extraordinaire expressing his thoughts on subjects ranging from science fiction to the effects of globalization. His sense of humor was evident through his extremely popular series named "Gulliver in Pataliputra" and "Modest Proposals" that were published in the local newspapers.